बुधवार, 24 सितंबर 2014

विश्व-शान्ति दिवस और हम

नन्द किशोर आर्य
गुरुकुल कुरुक्षेत्र
हरियाणा

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है, संस्कृत के इस सारस्वत कथन में मनुष्य ही नहीं अपितु सभी प्राणियों के प्रति बन्धुभाव प्रकट होता है। सृष्टि का कण-कण अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रतिक्षण कार्य में संलग्न है। ईश्वर की इस विराट संरचना में कुछ भी तो ऐसा नहीं है जो व्यर्थ हो। इन सब अद्भुत रचनाओं में विश्व की सभी आत्माओं को स्वतन्त्रता पूर्वक कार्य करने के लिए परमात्मा की ओर से प्राप्त अनुपम भेंट मानव के शरीर का मिलना है। मानव से भिन्न प्रत्येक प्राणी ईश्वर प्रदत्त स्वभाव के अनुकूल ही अपने-अपने कार्य में संलग्न हैं। इस सारी कायनात का बुद्धिपूर्वक यदि कोई सीधा-सीधा लाभ लेता है तो वह केवल और केवल मनुष्य ही है। विज्ञान के अधुनातन विकास से पूर्व तक मनुष्य अपने जीवन जीने के साधनों को प्राप्त करने में लगा रहा। आवश्यकताओं के अनुकूल होते गए आविष्कारों ने जहाँ मानव को सुख, समृद्धि एवं शान्ति प्रदान की वहीं बेतहाशा बढ़ती लालसा के कारण मानव ने अपने सहित पृथ्वी, आकाश, सागरों, नदियों, वनों एवं सम्पूर्ण प्रकृति मात्र को अशान्ति की ओर धकेल दिया है। स्वार्थ की पशुवृत्ति ने मानव को इतना निर्दयी बना डाला कि वह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने से उत्पन्न पीड़ा तक को अनुभूत नहीं कर पा रहा है।

प्रतिवर्ष विश्वभर में विश्व शान्ति दिवस अथवा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति दिवस 21 सितम्बर के दिन पूरी पृथ्वी पर अहिंसा को कायम रखने के लिए एवं शान्ति का सन्देश देने के लिये मनाया जाता है। यह दिवस सभी देशों और लोगों के बीच स्वतन्त्रता, शान्ति और प्रसन्नता का एक आदर्श माना जाता है। वर्ष 1982 से प्रारम्भ होकर 2001 तक सितम्बर मास के तीसरे मंगलवार को विश्व शान्ति दिवस के रूप में मनाया जाता रहा, लेकिन वर्ष 2002 से इसके लिए 21 सितम्बर का दिन निश्चित कर दिया गया, तब से यह दिवस इसी तिथि को मनाया जाता है।

प्रारम्भिक काल में व्यक्ति अपनी मूल आवश्यकताओं तक सीमित रहकर उपलब्ध संसाधनों से अपना काम चलाता रहा। समय बीतने के साथ ही मानव में संग्रह की प्रवृत्ति प्रबल होने लगी। संग्रह की गई वस्तुओं के संवर्धन एवं संरक्षण के साथ ही शान्ति की अथाह गहराई से उठकर उसने स्वयं ही अशान्ति का चोला ओढ़ना प्रारम्भ कर दिया। क्षणिक सुख की चाह में वस्तुओं का निरन्तर संग्रह करने से यह लबादा दिन-प्रतिदिन दृढ़ होता गया। सीमित आयु में असीमित पाने की इच्छा ही व्यक्ति को अशान्ति के गहरे गर्त में धकेल देती है। जो तेरा है वह तेरा ही है जो मेरा है वह भी तेरा है यह दैवीय भाव हैं, जो तेरा है वह तेरा है और जो मेरा है वह मेरा है यह मानवी भाव है, जो मेरा है वह मेरा ही है लेकिन जो तेरा है वह भी मेरा ही है यह आसुरी विचार मनुष्य के सुख-चैन को समाप्त कर घोर नरक की ओर ले जाने वाला है। जीओ और जीने दो की देव संस्कृति को छोड़ आसुरी कुसंस्कृति की ओर झुकना ही अशान्ति के प्रथम द्वार को खोलना है। अशान्ति व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, समाज से देश एवं देश से सम्पूर्ण वसुधा में प्रसृत होती गई। 

लगभग सभी देश इस समय जन-धन की अपार हानि से प्रतिदिन जूझ रहे हैं। इस वैश्विक हानि की समस्या का प्रमुख कारण मात्र आतंकवाद ही है। आतंकवाद विकृत, सड़ी-गली एवं उन्मादी मानसिकता से उत्पन्न मानवता के प्रति किया गया घृणित अपराध है। अकारण स्वयं ही किसी को भी अपराधी मानकर परमात्मा की इस सुन्दरतम रचना का विनाश करना कितना अधम व अक्षम्य अपराध है, इसकी कल्पना मात्र से ही शरीर के रोंगटे खडे़ हो जाते हैं। निरपराध एवं अबोध छोटे बालकों, प्राणों की भीख माँगती महिलाओं, असहाय व चलने में अक्षम वृद्धों व निःशस्त्र युवाओं पर घात लगाकर अथवा प्रत्यक्ष रूप से मौत के घाट उतार देना आतंकियों की पतित मानसिकता का परिचय देने के लिये पर्याप्त है। आह! इनकी नीचता की पराकाष्ठा तो तब देखने को मिलती है, जब वे कोमलमति लघुवय बालक-बालिकाओं के करुण-क्रन्दन को अनसुना कर, उनके हृदय व मस्तिष्क को चीरकर, अपना निवाला बनाकर, क्रूर पशुओं को भी लजा देते हैं। मानवता के इन घृणित अपराधियों की इस बिलबिलाहट के कारण सम्पूर्ण मानवजाति पर समाप्ति का खतरा मंड़रा रहा है।

दिलों में जिनके लगती है, वो आँखों से नहीं रोते।
जो अपनों के नहीं होते, किसी के भी नहीं होते।
समझते जो पराया दर्द, अपने दर्द से ज्यादा।
किसी के रास्ते में वो, कभी काँटे नहीं बोते।।

एक समुदाय दूसरे समुदाय को निगल जाना चाहता है, एक असभ्यता दूसरी सभ्यता को नष्ट करने पर उतारु है, एक जाति दूसरी जाति को समूल नष्ट कर देना चाहती है एक शक्तिशाली देश दूसरे दुर्बल राष्ट्र के संसाधनों को हड़प जाना चाहता है। समुदायों, सभ्यताओं जातियों एवं देशों को नष्ट कर देने वाली ये ताकतें मानवमात्र को शान्ति से जीने का अधिकार नहीं दे सकती ? नस्लभेद, अस्पृश्यता, जातिभेद, आर्थिक असमानता ऐसे विषबुझे तीर हैं जो मानवता को लम्बे समय से निरन्तर मर्माहत कर रहे हैं। इक्कीसवीं सदी के विकसित समाज में भी बहुत से लोग पाषाण युग के पाशविक काल में जीना पसन्द करते हैं। हम शान्ति लाने का प्रयास तो करें। अहिंसा परमो धर्म भारत का मूलमन्त्र रहा है। शान्तिप्रियता इस देश की अकूत सम्पदा सदा से रही है। यदि किसी क्रूर व आततायी शासक को शान्ति की राह में कभी रोड़ा भी समझा तो उसे ऐसे ही समाप्त नहीं कर दिया अपितु उसे सही राह पर आने के अवसर प्रदान किये गये। हमारे इतिहास में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने रावण को युद्ध से पूर्व शान्ति-सन्देश भेजा, योगिराज श्रीकृष्णचन्द्र महाभारत के युद्ध से पूर्व स्वयं शान्तिदूत बन कौरवों के पास गए। महात्मा चाणक्य ने घनानन्द से सीमाओं पर शान्ति रहे ऐसी ही प्रार्थना तो की थी। भयंकर परिणामों वाले हिंसा के मार्ग को कभी-कभी क्रूर व्यक्तियों को सबक सिखाने के लिए अपनाना पड़ता है। कभी-कभी हिंसा के गर्त से निकलकर सम्राट अशोक जैसे अहिंसक बन व्यक्तित्व महात्मा बुद्ध के अहिंसा के सदुपदेश को मानवमात्र तक पहुँचने का सफल प्रयास करते हैं।

परस्पर मैत्रीभाव शान्ति की जड़ों को गहराई तक ले जाता है। मित्रस्य चक्षुषा वयं सर्वाणि भूतानि समीक्षामहे अर्थात् हम सब एक दूसरे को मित्र की दृष्टि से देखें, यजुर्वेद का यह पावन मन्त्र शान्ति का पवित्र उद्घोष करता प्रतीत होता है। मनुर्भव जनया देव्यं जनम् हम सही मायनों में मनुष्य बन अपनी आने वाली पीढि़यों को भी मनुष्य बनने का उपदेश करें। आज भी असमानता का नर्तन समाज में देखने को मिल जाता है। समानता के साथ समरसता होने पर ही मानव, मानव बन सकता है लेकिन समरसता केवल समभाव से नहीं अपितु ममभाव से आती है, जब हम समता की बात करें तो वहाँ ममता को भी उच्चपद प्रदान करने की आवश्यकता रहती है। अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्। यह मेरा है यह तुम्हारा है यह तुच्छबुद्धि की बातें हैं, उदारचेता व्यक्ति पूरी वसुधा को एक परिवार मानकर व्यवहार करते हैं। आसुरी-भावों को मन-मन्दिर से बाहर निकाल फेंके। भौतिक उन्नति के साथ ही साथ आध्यात्मिक उन्नति की समाज में अत्यन्त आवश्यकता है। अक्षरज्ञान व तकनीकी ज्ञान के अतिरिक्त छात्रों को नैतिक व चारित्रिक ज्ञान भी करायें। आकाश की ऊँचाई को स्पर्श करने की अभिलाषा के साथ ही अपनी जमीनी हकीकत से भी वाकिफ रहें। जीवन में ऊँचा चाहे कितना भी उठें लेकिन नीचे पायदान पर खडे़ लोगों के हृदय के स्पन्दन की अनुभूति को महसूस अवश्य करते रहें तभी मानव जन्म की सार्थकता सिद्ध होगी।

विश्व शान्ति दिवस के उपलक्ष्य में मैं इतना ही कहना चाहता हूँ:-

शपथ लेकर हम निरन्तर शान्तिपथ पर ही चलें।
सामने बाधा हो कितनी, हिंसक विचारों को मलें।
क्रूरता कितनी हो फिर भी शान्तिभाव से बढे़ं पलें।
सुखी, नीरोगी सब हों नित अभाव किसी का कभी न खले।

सोमवार, 20 जनवरी 2014

थोड़ी सी जागरूकता

आध्यात्मिक चिन्तन के क्षण..............
आचार्य सत्यजित् जी
ऋषि उद्यान, अजमेर (राजस्थान)

          प्रभुकृपा से बहुत से मनुष्यों को जीवन का अंतिम लक्ष्य जानने-समझने का अवसर प्राप्त हो जाता है। यह संसार भले ही बहुत अधिक भौतिकवादी, बहुत अधिक विषयभोगी, बहुत अधिक बहिर्मुखी, बहुत अधिक अधार्मिक हो गया हो तथा और अधिक होता जा रहा हो। इस संसार में भले ही कितना अधिक आकर्षण हो, कितने अधिक फिसलन के अवसर हों, कितनी अधिक विपरीत स्थितियां  हों, फिर भी यहीं और इसी संसार में बहुत से मनुष्यों में साधना करने की भावना उभरती है, वे इसे जानने-समझने का प्रयास करते हैं और फिर साधना के लिए प्रयत्न भी आरम्भ कर देते हैं, तदनुरूप सफलता भी प्राप्त करते रहते हैं।
          संसार की इतनी विपरीत दिखाई देने वाली स्थिती में भी प्रभुकृपा से बहुत से व्यक्ति साधना का निश्चय कर पाते हैं, यह संभव है, यह प्रत्यक्ष है। संसार के आकर्षण, विषय-भोग के कारण मनुष्य को क्षण-क्षण में फिसलते देखा जाता है, अन्याय-अत्याचार-अधर्म करते देखा जाता है। इसे अन्यों में व अपने में बार-बार होता देख कर बहुत स्वयं को व अन्यों को साधना के अयोग्य समझने लगते हैं, किन्तु बहुत से मनुष्य इससे सीख लेकर साधना की ओर और अधिक प्रवृत्त हो जाते हैं, अपने को साधना-मार्ग में और अधिक दृढ़ कर लेते हैं।
          प्रभुकृपा से प्रत्येक मनुष्य को ऐसे अन्तःकरण मिले हैं, जिनका सदुपयोग करके वह जीवन के सही मार्ग पर चल सकता है, साधना में प्रवृत्त होकर अपने जीवन को साधनामय बना सकता है। संसार के विषय-भोग व ऐश्वर्य अन्यन्त आकर्षक हैं, प्रथम दृष्ट्या यही अनुभव में आता है, यही अनुभव में आयेगा। इस आकर्षण व विषय-भोग के काल में जो मनुष्य थोड़ी सी जागरूकता रख पाता है, वह इनके दल-दल से ऊपर उठ जाता है। प्रभुकृपा से जागरूकता सभी व्यक्ति रख सकते हैं, प्रत्येक के पास इतना सामर्थ्य व साधन (अन्तःकरण) उपलब्ध हैं। विषयाकर्षण के समय यदि मनुष्य बह भी जावे, किन्तु थोड़ी से जागरूकता साथ में रख ले, तो बार-बार विषय-प्रवाह में बहने-फिसलने पर भी वह एक समय आने पर इनसे विरत होने लगता है।
प्रभुकृपा से संसार के विषय-भोग, आकर्षण, ऐश्वर्य ऐसे कभी नहीं थे, न हैं व न होंगे कि मनुष्य इनमें सदा फंसा-धंसा रह जाये। थोड़ी सी जागरूकता रख लेने से मनुष्य अपने को विषय-प्रवाह में देर तक सहन नहीं कर सकता। आत्मा को जिस सुख-शान्ति की पिपासा है, वह वहां होता ही नहीं है, तो आत्मा उसे कैसे सहन कर सकता है ? यदि जागरूकता नहीं है, तब तो उसे संसार के सुख ही अन्तिम सुख लगेंगे, तब तो संसार के दुःखों को भोगता हुआ, उनसे पीड़ित होता हुआ, उनसे पिसता हुआ भी वह संसार के सुखों को पाने की तृष्णा में ही डूबा रहेगा।
          प्रभुकृपा से इस थोड़ी से जागरूकता के लिए जितान ज्ञान, जितनी समझ प्रारम्भ में चाहिए, वह हर मनुष्य को मिलती रहती है। यदि उस थोड़ी सी समझ, थोडे़ से ज्ञान, थोडे़ से अनुभव की रक्षा की जाये, उसे रक्षित करने व बढ़ाने का प्रयत्न किया जाये, तो यही अनुभव-ज्ञान-समझ मनुष्य को साधना-पथ पर प्रवृत्त व स्थिर करने का सर्वप्रमुख व निश्चित कारण बन जाता है। ऐसा व्यक्ति साधना न कर पाने का दोष संसार, समाज, परिस्थिति आदि को नहीं देता। संसार, समाज, परिस्थिति आदि के विपरीत होने पर भी इस अनुभव-ज्ञान-समझ के आधार पर अपनी आंतरिक अवस्था ऐसी बना लेता है कि बाह्य बाधायें उसे साधना से हटा नहीं पातीं। यदि थोड़ा विचलन आता भी है तो वह एक नया अनुभव देकर जाता है, नई समझ देकर जाता है। यही समझ-जागरूकता उसे और अधिक सबल बना देती है, वह पुनः साधना-पथ पर आरूढ़ व स्थिर होकर अपने चरम लक्ष्य को पाने में संलग्न हो जाता है।

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

अमूल्य जीवन

आध्यात्मिक चिन्तन के क्षण..............
आचार्य सत्यजित् जी
ऋषि उद्यान, अजमेर (राजस्थान)

     प्रभुकृपा से यह मानव शरीर मिला। प्रगति का अद्वितीय अवसर। मुक्ति के बारे में कुछ सोचने-करने का एक मात्र अवसर। एक दुर्लभ अवसर जो चित्त-शुद्धि का अवसर प्रदान करता है, ऐसा अवसर जो योग-साधना जैसी पवित्र प्रक्रिया को जानने-समझने-करने के लिये समर्थ है।
    यह सब जानते-समझते हुए भी हम इस दिशा में अल्प प्रयत्नशील हैं। बार-बार भावनापूर्वक प्रयास करते हुए भी पुनः पुनः शिथिल हो जाते हैं। मानव-जीवन को प्रभुकृपा मानते हुए भी ईश्वर के प्रति बहुत कम कृतज्ञ हो पाते हैं। प्रभुकृपा को स्वीकारते हुए भी उसकी अति शुभ व सर्वथा कल्याणी वाणी-उपदेश के प्रति गंभीर नहीं रह पाते हैं। प्रगति का अद्वितीय अवसर पाकर भी इससे वह अद्वितीय प्रगति नहीं कर पाते, जो परमपिता परमात्मा हमसे चाहता है। परमपिता परमात्मा की हम पुत्रों-आत्माओं से अपेक्षा है कि हम संपूर्ण दुःखों से दूर होकर ईश्वरीय नित्य-आनन्द को प्राप्त करें। यह अद्वितीय मानव-जीवन अद्वितीय न रहकर द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ स्तर का बन गया है, क्योंकि हम द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ या और भी निचले स्तर के कार्यों-लक्ष्यों को ध्यान में रख कर जीवन बिताने लगे हैं।
      प्रभुकृपा से मुक्ति के लिये मिले इस एक मात्र अवसर मानव-जीवन को हम एक मात्र मुक्ति के लिये न सोचकर अन्य सामान्य प्रयोजनों के लिये बिताये चले जा रहे हैं। यह दुर्लभ अवसर चित्त-शुद्धि के लिये न होकर चित्त-विकृति के लिये उपयोग में लिया जा रहा है। लौकिक व्यवहारों में आसक्त होकर हम अनजाने ही चित्त को अत्यधिक अशुद्ध किये जा रहे हैं। थोड़ी बहुत की जाने वाली शुद्धि की क्या सार्थकता रह जाती है, जब हम उससे बहुत अधिक अशुद्धि बटोरते जा रहे हैं।
     प्रभुकृपा से योग-साधना के प्रति श्रद्धा व आदर का भाव रखते हुए भी, इसे श्रेष्ठ मानते हुए भी, इसे सुख-शान्ति-धैर्य-संतोष-तनाव रहित अवस्था की प्राप्ति का उपाय मानते हुए भी इसकी उपेक्षा करते चले जा रहे हैं। दिन-भर में मिले समय में से अत्यल्प समय योग-साधना के लिये दे रहे हैं।
     प्रभुकृपा से हम इस दिशा में कुछ सोचना भी आरम्भ कर दें, तो जीवन में पवित्रता-शांति-संतोष का अवतरण होना ही है। कठिन दिखने वाली योग-साधना जीवन में उतरने लगेगी ही। प्रभु का दिखाया मार्ग अचूक है, अपवाद रहित है, परम-कल्याण-कारक है।

बुधवार, 1 जनवरी 2014

आन्तरिक शुद्धि - प्रतिदिन का कार्य


आध्यात्मिक चिन्तन के क्षण..............

आचार्य सत्यजित् जी
ऋषि उद्यान, अजमेर (राजस्थान)

      प्रभुकृपा से हमें अत्युत्तम उपकरण मन-बुद्धि की प्राप्ति हुई है। मानव शरीर में ये दोनों सबसे प्रमुख हैं। इनके समुचित प्रयोग से हम मुक्ति को प्राप्त कर सकते हैं और दुरुपयोग से बंधन में रहते हुए दुःख को भोगने के लिए बाध्य होते रहते हैं। मन-बुद्धि की मलिनता के रहते जब इनका प्रयोग किया जाता है, तो ये हानिकारक-बंधनकारक-दुःखदायक बन जाते हैं। मन-बुद्धि की मलिनता कम हो या मलिनता न हो तो ये लाभदायक-मुक्तिदायक-सुखदायक बन जाते हैं।
      मन-बुद्धि की अशुद्धि-मलिनता जन्मजन्मान्तरों की है। पूर्व के न जाने कितने जन्मों से हम विषय-भोग, राग-द्वेष, काम-क्रोध-लोभ-मोह-ईष्र्या-अहंकार आदि करते चले आ रहे हैं, उन सबकी मलिनता के ढेर को साथ लेकर हम जन्मे थे। इस जन्म में भी बाल्यावस्था से ही पूर्व कुसंस्कार व अज्ञानता के कारण पुनः पुनः विषय-भोग, राग-द्वेष आदि की ओर प्रवृत्त होते रहते हैं। इस प्रकार हमने अपनी मलिनता को और बढ़ा लिया होता है। जब तक हमें इस मलिनता व इसकी हानियों का बोध नहीं होता, हम इसी तरह जीवन जीते हुए अपने अन्तःकरण को और अधिक मलिन करते चले जाते हैं।
प्रभुकृपा से हमें इस बार मानव शरीर मिला है। यही एक मात्र जीवन है जिसमें हम अपनी मलिनता को हटा सकते हैं। प्रभुकृपा से जिन्हें कुछ बोध हो गया है और जो अपने को शुद्ध करने में लग गये हैं, वे भी पूर्व कुसंस्कारों व अज्ञान के कारण बार-बार अपने को मलिन भी करते रहते हैं। ऐसे मानव जिन्हें इस मलिनता की कुछ समझ बन गई है, जो नई मलिनता से कुछ बचते भी हैं और पुरानी मलिनता को हटाने का प्रयास भी कर रहे होते हैं, वे भी प्रायः अपने इन कुछ प्रयासों को पर्याप्त समझने लगते हैं। इसका कारण यह है कि कुछ प्रयास भी श्रमसाध्य होते हैं, हम अपने इस श्रम को पर्याप्त समझकर संतुष्टि का भाव बना लेते हैं तथा अधिकांश अन्यों को इस दिशा में कुछ न करता देख या बहुत कम करता देख, अपने प्रयास को अधिक/पर्याप्त मान बैठते हैं।
      प्रभुकृपा से हमें अपनी मलिनता की अधिकता व भयंकरता का सम्यक् बोध हो जाये तो हमें आन्तरिक-शुद्धि के लिये किये जा रहे अपने प्रयास बहुत कम लगेंगे। धार्मिक कहे-समझे जाने वाले अधिकांश व्यक्ति दिन-भर में कुल मिलाकर अपनी मलिनता को कुछ बढ़ा रहे होते हैं। हमें वर्तमान में प्रतिदिन होने वाली मलिनता को भी पूरा हटाते रहना है व पिछली मलिनता को भी कुछ न कुछ कम करते रहना है। यदि हम प्रतिदिन होने वाली मलिनता को ही हटाते रहें, तो भी मुक्ति नहीं पा सकते, क्योंकि पिछली मलिनता तो अभी बनी हुई है। इससे इतना बड़ा लाभ होगा कि हम पतन को प्राप्त नहीं होंगे, पर इतने मात्र से उन्नति तो नहीं होगी, मात्र यथास्थिति बनी रहेगी।
      प्रभुकृपा हम पर है। प्रभुकृपा को सदुपयोग में लाकर हमें प्रतिदिन आन्तरिक-शुद्धि को करना है। हमें प्रतिदिन पिछली मलिनता को भी कुछ न कुछ कम करना है। नई मलिनतायें जो पूर्व संस्कारवशात्, परिस्थितिवशात्, असावधानी से या जागरूकता की कमी से बन जाती हैं उन्हें भी हटाना है। नई मलिनता न आने पाये, इसकी भी पूरी सावधानी रखनी है। प्रभु की कृपा से, ऋषियों की कृपा से इस विषय का ज्ञान वेदों में, उपनिषदों में, दर्शनों में व अन्य ऋषिकृत ग्रन्थों में आज भी उपलब्ध है। जागरूक व्यक्ति स्वयं भी मार्ग खोजकर आगे बढ़ सकता है। हमारे लिये यह परम सौभाग्य की बात है कि हम प्रतिदिन अपनी आन्तरिक-शुद्धि कर पायें, इतनी कि वह शुद्धि की मात्रा नई मलिनता की मात्रा से कुछ न कुछ अधिक हो।
आन्तरिक-शुद्धि का यह कार्य दीर्घकालसाध्य है। यह बडे़ धैर्य की अपेक्षा रखता है। इसका परिणाम बहुत अच्छा व बड़ा है। यह आनन्द, सन्तोष व आत्मविश्वास को देने वाला है। आन्तरिक-शुद्धि में लगा व्यक्ति योग-मार्ग में स्थिर हो जाता है, उसका सारा विचलन व भटकाव समाप्त हो जाता है। वह प्रभु की विशेष कृपा का पात्र बन जाता है।

शनिवार, 16 मार्च 2013

दयानन्द दिव्य दर्शन भूमिका


लेखक: श्री देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय



हमसे हमारे बन्धुवर्ग बार-बार यह प्रश्न करते हैं कि तुम यह क्या कर रहे हो ? मनुष्य पृथ्वी पर जन्म लेकर जो काम करते हैं; जिस मार्ग का अनुसरण करते हैं, तुम उनमें से कोई काम भी नहीं करते ? तुमने अपने जीवन का इतना समय केवल ‘दयानन्द-दयानन्द’ की रट लगाकर गंवाया है। जीवन के जिस अंश को सबसे श्रेष्ठ माना जाता है तुमने उसे ‘दयानन्द- दयानन्द’ कहके ही बिताया है।

बन्धुवर्ग का यह आक्षेप सर्वथा निर्मूल भी नहीं है, क्योंकि गत १५ वर्ष के अधिक भाग को हमने दयानन्द-सम्बन्धी कार्य में ही लगाया है। दयानन्द सरस्वती की जीवन-कथा के कीर्तन करने, दयानन्द के एक सर्वांग-सुन्दर जीवन-चरित के प्रकाशित करने के अभिप्राय से सामग्री और विवरण-माला के संग्रह करने में पूरे १५ वर्ष न भी लगे हों पर इसमें तो सन्देह ही नहीं है कि १॰ वर्ष तो अवश्य ही लगे हैं।

सहस्रों रुपयों की प्राप्ति के लिए मनुष्य जितना उत्साह और परिश्रम करता है, हमने उतना उत्साह और परिश्रम दयानन्द के जीवन की एक-एक घटना का पता लगाने में व्यय कर दिया है। एक ही घटना की सत्यता का निश्चय करने के लिए हम अनेक बार एक ही स्थान में गए हैं। जिस समय भी यह सुना कि अमुक स्थान पर अमुक व्यक्ति के पास जाने से दयानन्दचरित की अमुक घटना का ठीक-ठीक पता लग सकता है, हम उसी समय टिकट लेकर सैकड़ों मील की यात्रा करके उस स्थान पर पहुंचे हैं। हमारी यह दशा रही है कि यदि आज हम अजमेर हैं तो कुछ दिन पीछे अमृतसर हैं, और दो मास पीछे मध्यभारत के इन्दौर नगर में हैं, कभी महाराष्ट्र देश में कोल्हापुर में हैं तो कभी संयुक्तप्रान्त में गंगा के तटवर्ती ग्राम कर्णवास में। इसी प्रकार इस विशाल भारतवर्ष के सभी प्रान्तों में (केवल मद्रास प्रान्त को छोड़कर) बरसों पर्यटन किया है। न हमने जाडे़ की परवाह की है न गर्मी की, न शरीर के स्वास्थ्य की ओर ध्यान दिया, न अस्वास्थ्य की ओर। कभी-कभी हम धनाभाव के कारण अस्थिर तो हो गये, परन्तु हमने अपने व्रत को नहीं तोड़ा। प्रवास के कष्ट-क्लेश को भी हर प्रकार सहन किया। जो व्रत हमने धारण किया था, उससे हमें किसी वस्तु ने एक दिन के लिए भी विचलित नहीं किया, न प्रबल धनाभाव ने, न अनेक प्रकार की बाधाओं ने और न ही प्रवास की असुविधाओं से उत्पन्न हुए सामयिक नैराश्य ने। परन्तु प्रश्न यह है कि इस कठिनाइयों ने हमें विचलित क्यों नहीं किया ? दयानन्द कौन है ? उसकी शिक्षा में ऐसी कौन-सी अलौकिक शक्ति है, इसके उपदेशों में ऐसा कौन-सा संजीवन मन्त्र छिपा हुआ है, जिसके कारण हम उसके जीवन-इतिहास के लिए क्लेश पर क्लेश सहते आये हैं ? दयानन्द के चरित के प्रकाशन के साथ भारत-भूमि का ऐसा कौन-सा हिताहित सम्बद्ध है जिसके कारण हमने सैकड़ों प्रतिकूलताओं के बीच में अपने आपको अटल रखा है ? दयानन्द की शिक्षा व उदाहरण के साथ बंगवासियों का, बल्कि भारतवासियों का और इससे भी अधिक पृथ्वीभर के रहनेवालों का ऐसा कौनसा कल्याण अनुस्यूत है जिसके कारण हमने अपने आपको इस भीष्म प्रतिज्ञा में बांधा है ? इन प्रश्नों का ठीक-ठीक उत्तर देना आवश्यक है। इसलिए हम अपने लेख को कुछ खोलकर लिखने का यत्न करेंगे।



महर्षि दयानन्द सरस्वती


दयानन्द दिव्य दर्शन


जन्म १८२४ मोक्षप्राप्ति १८८३

बाल्यावस्था का नाम                        मूलशंकर
पितृनाम                        श्री करसन जी तिवारी
मातृनाम                        श्रीमती यशोदा देवी
जन्मस्थान                        टंकारा (गुजरात)
यज्ञोपवीत संस्कार                        १८३४
बोध का प्रथम आलोकन
एवं प्रभुप्राप्ति का संकल्प                 शिवरात्रि १८३८
यजुर्वेद सम्पूर्ण कण्ठस्थ                 १८३८
गृहत्याग                         १८४५
ब्रह्मचर्यदीक्षा (शुद्धचैतन्य)         १८४६
सन्यासदीक्षा-स्वामी पूर्णानन्द जी
से दयानन्द नाम धारण                 १८४८
मथुरा में स्वामी विरजानन्द जी दण्डी
के पास शास्त्राध्ययन                         १४-११-१८६॰ से ७-४-१८६३ तक
हरिद्वार कुम्भ पर पाखण्ड-खण्डिनी पताका १२-३-१८६७
वैचारिक क्रान्ति और वैदिक संस्कृति की
पुनः स्थापना के अमर ग्रन्थ
‘सत्यार्थ प्रकाश’ का लेखन                         ७-४-१८७४
आर्यसमाज की स्थापना                 ७-४-१८७५
संस्कारविधि का लेखन                 १८७६
ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका का लेखन         १८७७
जीवन चरित्र का प्रकाशन                         १५-१२-१८७७
देहत्याग एवं मोक्षप्राप्ति                दीपावली ३॰-१॰-१८८३

जीवनकाल वर्ष - ५९


लेखक: श्री देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय

बुधवार, 13 मार्च 2013

दयानन्द दिव्य दर्शन प्राक्कथन



लेखक: श्री देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय

जैसे एक नदी की सृष्टि नाना दिग्देशागत जल-धाराओं के समवाय से होती है, वैसे ही मनुष्य जीवन की सृष्टि भी नाना व्यक्ति और प्रवाह-समूह के समवाय से होती है। जिन्होंने ऊंचे पर्वत पर खडे़ होकर किसी नदी विशेष के उत्पत्ति स्थान को देखा है, वे जानते हैं कि कितने छोटे-बडे़ स्रोत भिन्न-भिन्न दिशाओं से आकर आपस में मिलकर नदी की उत्पत्ति करते हैं। मनुष्य-जीवन भी ठीक इसी प्रकार से उत्पन्न होता है। किसी एक मनुष्य के जीवन की पर्यालोचना करने से मालूम होगा कि उसमें अनेक विभिन्न प्रभावों का सम्मिलन हुआ है। यदि विचार करके देखा जाये कि मैं कौन हूं, यदि अहंभाव का विश्लेषण किया जाये और देखा जाये कि मेरा संगठन किस उपादान से हुआ है। मैं किस-किस शक्ति के समवाय से सृष्ट हुआ हूं, मेरे ‘मैं’ में मेरा कितना निजू भाग और कितना दूसरों का है, तो ज्ञात होगा कि उसमें अनेक छोटे-बडे़ प्रभावों का समवाय है। प्रथम पूर्वजन्मार्जित संस्कार, दूसरे पितृ-शक्ति, तीसरे मातृ-शक्ति, चौथे परिवेष्टनीय शक्ति, पांचवे शिक्षा शक्ति। इन्हीं प्रधान-प्रधान पांचों शक्तियों के स्रोतों के समवाय से मनुष्य की जीवननदी बनती है। इनके अतिरिक्त सूक्ष्मभाव से देखने से उसमें  और भी छोटी-बड़ी शक्तियों का समवाय देखने में आता है। प्रागुक्त परिवेष्टनीय शक्ति के साथ जन्म-गृह, जन्म-स्थान और जन्म-पल्ली का घनिष्ठ सम्बन्ध है।

परिवेष्टनीय शक्ति उसे कहते हैं, जिससे मनुष्य अहरहः घिरा रहता है। उसके भीतर मनुष्य के चतुर्दिग्वर्ती चेतन, अचेतन और उद्भिज्जादि समस्त पदार्थभूत की शक्ति परिगणित होती है। हमने जिस घर में जन्म लिया, उसके चतुर्दिक्स्थ जो कुछ भी है, वह सब हमारे मन पर अपने प्रभाव का विस्तार करता है। जिस ग्राम में हमने जन्म लिया है, उसमें जो कुछ भी है, वह हमारे मन कों संगठित करने में सहायता करता है। जिस स्थान वा जिस ग्राम में हम भूमिष्ठ हुए हैं उसके वृक्ष, लता, नदी, सरोवर, क्षेत्र, जंगल, वनभूमि, शिलास्तूप सब पदार्थ ही हमारे मनोराज्य को विकसित करते हैं। यह एक विवादरहित सत्य है कि मनुष्य का अध्यात्मजगत् जिस प्रकार बाह्यजगत् के ऊपर कार्य करता है, बाह्यजगत् भी उसी प्रकार अध्यात्मजगत् के ऊपर अहरहः अपना प्रभाव करता है। नदी की कल्लोल, सागर-वृक्ष का प्रकम्प, अत्युच्च शैल की गम्भीरता, विस्तीर्ण मरु प्रान्तर की भीषणता, मेघमाला की घन-गम्भीर नीलिमा, निबिड वनभूमि की अपरिच्छिन्न निस्तब्धता, सब ही मनुष्य की चित्तवृत्ति का संगठन करती हैं। यही मनस्तत्त्व पण्डितों ने स्थिर किया है। इसलिये हम कहते हैं कि जो लोग संसार में महाजन के नाम से विख्यात हैं, जो महान् मन और विशाल बुद्धि पाकर धरित्री के पृष्ठ पर आविर्भूत हुये हैं, प्रायः वे सब ही प्रकृति की सुन्दरतर महिमा या रुद्रतर भाव के क्रोड में लालित, पालित और परिवर्धित हुए हैं।

अस्तु ! अगण्य-सुगण्य, पण्डित-मूर्ख, प्रातःस्मरणीय-परिवर्जनीय, भिखारी-प्रासादवासी, किसी भी मनुष्य को समझने का यदि यत्न किया जाय, अथवा मनुष्य जीवन को यदि यथार्थ रूप से चित्रित करके देखा जाए तो यह जानना आवश्यक है कि उसके भीतर परिवेष्टनीय शक्ति ने कितना कार्य किया है। विशेषतः जो महापुरुष हैं जिनके आविर्भाव से धरित्री पवित्र हुई है, जिनके प्रभाव से जन-समाज की गति पलटी है, वस्तुतः जो मनुष्य समाज के प्राण और मेरुदण्ड स्वरूप हैं, उनके चरित्र के वर्णन में उनकी जन्मभूमि का वर्णन अपरिहार्य रूप से आवश्यक है।

जिन्होंने इस पापपरिपुष्ट युग में जन्म लेकर जीवनभर निष्कण्टक ब्रह्मचर्य का पालन किया, जो विद्या में, वाक्पटुता में, तार्किकता में, शास्त्रदर्शिता में, भारतीय आचार्य-मण्डली के बीच में शंकराचार्य के ठीक परवर्ती आसन पर आरूढ़ होने के सर्वथा योग्य थे, वेदनिष्ठा में, वेदव्याख्या में, वेदज्ञान की गम्भीरता में, जिनका नाम व्यासादि महर्षिगण के ठीक नीचे लिखे जाने योग्य था, जो अपने को हिन्दुओं के आदर्श-सुधारक पद पर प्रतिष्ठित कर गये हैं और इस मृतप्राय आर्यजाति को जागरित करके उठाने के उद्देश्य से मृतसंजीवनी औषध के भाण्ड को हाथ में लेकर जिन्होंने भरतखण्ड में चतुर्दिक् परिभ्रमण किया था, दुःख का विषय है कि उनका चरित्र और उनकी जन्मभूमि का प्रसंग आज तक भी अप्रकाशित है। वह भारत-दिवाकर दयानन्द कहां जन्मा था, यह आज तक भी कोई नहीं जानता। आज प्रायः ३३ वर्ष स्वामी दयानन्द सरस्वती को स्वर्गारोहण किए हो गये और जिस आर्यसमाज को इन्होंने इस उद्देश्य से स्थापित किया कि उनके उपदेशों का संसार में प्रचार करें, उसकी आयु भी प्रायः ४॰ वर्ष हो गई, परन्तु उसने स्वामी जी के जन्म स्थानादि जानने के विषय में कोई विशेष यत्न नहीं किया। यद्यपि दयानन्द के जीवन-वृत्त के सम्बन्ध में कितने ही ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं, परन्तु उनमें किसी में भी उनकी जन्मभूमि की कथा निश्चित रूप से नहीं लिखी गई। इसलिए दयानन्द के जितने जीवन-चरित उपस्थित हैं, वे सब अपूर्ण और अंगहीन हैं। इसलिये आवश्यक है कि उनकी जन्मभूमि के विषय में पूरा अनुसंधान और अन्वेषण किया जाय। इस कार्य को करने का हमने बीड़ा उठाया और हर्ष का विषय है कि असीम प्रयत्न और अनथक परिश्रम के पश्चात् हम अपने संकल्प को पूरा करने में कृतकार्य हुए हैं।

सत्य की खोज के लिए अनुसंधान के अविश्रान्त स्रोत का प्रवाहित रहना, गवेषणा के आलोक का प्रदीप्त रहना और जहां तक हो सके, उसे ले जाये जाना सत्य के निर्णय के लिए गवेषणा का पुनः पुनः परिचालन करना आवश्यक है, इसी प्रकार की घटना-विशेष का लोगों के सामने उज्ज्वल रूप में रखने के लिए और उसे दृढ़तर भित्ति पर प्रतिष्ठित करने के लिए अनुसंधान कार्य में बार-बार व्यापृत होना भी अपरिहार्य है। तब तक वह स्फुटतर और उज्ज्वलतर नहीं हो सकती; जब तक अनेक प्रमाणों को प्रस्तुत नहीं किया जाता, तब तक वह दृढ़तर भूमि के ऊपर स्थापित नहीं हो सकती और यह निर्विवाद है कि नानादिक् से आलोक पात करना और अनेक प्रमाणों का संग्रह करना कष्टसाध्य है।

अतः जो कष्ट हमने सहे, जो धन और समय हमने व्यय किया, उस पर हमें तनिक भी पश्चात्ताप नहीं, क्योंकि दयानन्द के जीवन-चरित का महान् विषय बिना इसके लिखना असम्भव था और उसका लिखना देश के कल्याण के लिए आवश्यक था।

देवेन्द्रनाथ मुखोपध्याय
सन् 1916