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शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

ब्रह्मवृत्ति

स्वामी विद्यानंद जी 'विदेह'

युंजते मन उत युंजते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः। 
वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः।।

{यजुर्वेद ५.१४, ¬११.४, ३७.२} ऋग्वेद ५.८१.१

यह मानव-शरीर आत्मा की परिस्तुति वा महिमा है। आत्मा शरीर का सविता देव है। ‘सविता’ आ अर्थ है स्रष्टा और संचालक। आत्मा के मिष से ही शरीर की रचना होती है, और आत्मा ही शरीर का संचालन करता है। मनुष्यदेह कैसी कुशल, पूर्ण और अद्भुत मशीन है, और आत्मा कैसी कुशलता से इसके कण-कण, अणु-अणु और अंग-प्रत्यंग का संचालन करता है। शरीर दिखाई देता है पर आत्मा दिखाई नहीं देता। जब किसी महात्मा की महिमा श्रवण करके वा उसकी किसी कृति से परिचित होकर हम उसके दर्शन करने जाते हैं तो हम उसके दर्शन करके उसको प्रणाम करते हैं, उसका स्तवन करते हैं और अपने को कृतकृत्य मानते हैं। दर्शन केवल शरीर का होता है, आत्मा का नहीं। जो दृष्टि का विषय है, दर्शन उसी का होता है। दृष्टि का विषय न होने से, आत्मा का नेत्रों से दर्शन नहीं हो सकता। फिर भी, यह सत्य है कि हम महात्मा के दर्शन करते हैं। महात्मा में महा-आत्मता है वह आत्मा की ही है पर आत्मा दिखाई नहीं देता। क्योंकि महात्मा का शरीर उसके आत्मा से व्याप्त है अतः उस महात्मा के शरीर के दर्शन में उसके आत्मा का दर्शन भी सन्निहित है। नेत्रों से हम महात्मा के शरीर के दर्शन करके, आत्मना उसके आत्मा से आत्मीयता करते हैं।

यह सम्पूर्ण समष्टि भी उस विश्वात्मा सविता देव का विराट् शरीर है, द्यौ जिसका मूर्धा है, नद्वात्र जिसके केश हैं, सूर्य-चन्द्र जिसके नेत्र हैं, अन्तरिक्ष जिसका उदर है, भूमि जिसका पाद है, और वात जिसका प्राणापान है अनादि, अनन्त और असीम विश्वात्मा की यह समष्टिदेह भी प्रवाह से अनादि, अनन्त और असीम है। नेत्रों से उस अवश्वात्मा के विराट् स्वरूप का दर्शन कीजिए। विश्वात्मा से विराट् की और विराट् से विश्वात्मा की पृथक्ता हो ही नहीं सकती। अतः मानव-शरीरवत् विराट् के दर्शन में विश्वात्मा का दर्शन भी सन्निहित है।
यह सूत्रधार विश्वात्मा इस समष्टि सृष्टि में रमा हुआ, इसकी प्रत्येक चेष्टा को चेष्टित करता हुआ, नाना-लोकरूपी इन्द्रियों का संचालन कर रहा है। प्रत्येक चेष्टा और गति में, प्रत्येक दृश्य और दर्शन में, प्रत्येक स्वर और गान में, प्रत्येक गीति और प्रगान में, प्रत्येक लय और तान में, प्रत्येक रस और सुगन्ध मंे सर्वत्र ब्रह्म की महिमा का अवलोकन करते हुए, ब्रह्मदृष्टि और ब्रह्मानुभूति का अभ्यास कीजिए। इस अभ्यास के पकने पर आपको ब्रह्मवृत्ति की सिद्धि प्राप्त हो जाएगी।

(विप्राः) मेधावी जन, योगी जन (मनः) मन को (युंजते) युक्त करते हैं (उत) और (धियः) धारणाओं को (युजते) युक्त करते हैं। 

वह (वयुन्-वित्) सब चेष्टाओं-गतियों का जानने वाला (एकः इत्) एक ही, अकेला ही (होत्रा) होत्रों, यज्ञों, लोक-लोकान्तरों को (वि दधे) धारण कर रहा है।

उस (बृहतः) महान् (विपश्चितः) ज्ञानी (विप्रस्य) मेधावी, बुद्ध (सवितुः देवस्य) सविता देव की (परि-स्तुतिः) अभिस्तुति, महिमा (मही) महती है।



माधुर्य

स्वामी विद्यानंद जी 'विदेह'

मधुमन्म निक्रमणं मधुमन्मे परायणम्।
वाचा वदामि मधुमद् भूयासं मधुसंदृशः।।

अथर्ववेद १.३४.३

क्रोध, कटुता, रूक्षता, उद्विग्नता स्वभाव-सम्बन्धी भयंकर दोष हैं। इनसे नितराम् चित्त में विक्षोभ, मन में अशान्ति, बुद्धि में असन्तुलन और इन्द्रियों में चंचलता का प्रस्फुटन होतर रहता है जिससे मनुष्य का समाहितचित्त, शान्तमन, समबुद्धि और स्थिरेन्द्रिय होना कठिन ही नहीं, सर्वथा असम्भव होता है। इन स्वभावदोषों के निवारण के लिए मधुरता का अभ्यास कीजिए। मधुरता के अभ्यास के लिए उपर्युक्त मन्त्र को शब्दार्थसहित कण्ठस्थ करके, उसका सदा सर्वदा गान कीजिए। (मे) मेरा (नि-क्रमणम्) निकट आना, मिलना (मधुमत्) मधुयुक्त, मधुर हो। (मे) मेरा (परा-अयनम्) प्रत्यागमन, बिछुड़ना, वियुक्त होना (मधु-मत्) मधुर हो। मैं (वाचा) वाणी से (मधुमत्) मधुर (वदामि) बोलूं। मैं (मधु-सम्-दृशः) मधु-सदृश, मधु सं-दृष्टि (भूयासम्) हो जाऊं।
जो जिस पदार्थ का सार होता है उसमें उस पदार्थ के गुण होते हैं। मधु नाम शहद का है। मधु पुष्पों का सार होता है। मधु में पुष्पों की स्निग्धता, मधुरता, सुगन्धि, सोम्यता, सुन्दरता, प्रसन्नता सन्निहित है। अतः मधुसेवी बनिए। मधु के समान सारग्राही, स्निग्ध, मधुर, सुगन्धित, सोम्य बनिए। मधुरता को अपनी प्रकृति बना लीजिए। सर्वथा मधुर स्वभाव हो जाइए। अपना ऐसा शील बनाइए, कि क्रुद्ध और अशान्त मनुष्य अथवा प्राणी आपसे मिलकर सहसा मधुर और शान्त हो जाए। जब कोई व्यक्ति आपसे वियुक्त {विदा} हो तो वह माधुर्य और स्नेह के साथ वियुक्त हो। आपका मिलना और बिछुड़ना माधुर्योपेत तभी होगा जब आपकी वाणी मधुर होगी। वाणी में माधुर्य तभी होगा जब आप मधुहृदय होंगे, साक्षात् माधुर्य हो जाएंगे, अन्दर-बाहर से साक्षात् मधु बन जाएंगे, और सब आपकी दृष्टि मधुदृष्टि बन जाएगी।

मधुरस्वभाव, मधुहृदय, मधुजिह्व व्यक्ति सदा शीतल, शान्त, सुखी, प्रसन्न, आनन्दित, प्रीतिमान्, सर्वप्रिय, समाहित, सन्तुलित, संयत, निश्चल और सन्तुष्ट रहता हुआ प्रत्येक क्षेत्र में विजयसाफल्य प्राप्त करता है। मधुर, शान्त आत्मा विकट से विकट परिस्थितियों को मुस्कराहट के साथ परास्त करता हुआ, जटिल से जटिल समस्याओं को सहजतया सुलझा लेता है।

मधुरता की भावना से सदा माधुर्योपेत रहिए। विचारों में मधुरता हो, दृष्टि में मधुरता हो, वाणी में मधुरता हो, हृदय में मधुरता हो, मन में मधुरता हो, चित्त में मधुरता हो। आप मधुर हो जाएंगे तो संसार में आपको सर्वत्र माधुर्य ही माधुर्य अनुभव होगा। माधुर्य से ही ब्रह्ममाधुर्य की अनुभूति होगी।



गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

निःस्पृहता

स्वामी विद्यानंद जी 'विदेह'
प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु।
प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये।।

अथर्ववेद १९.६२.१

‘स्पृहा’ का अर्थ है इच्छा, चाहना, कामना। मनुष्य की स्पृहा का क्षेत्र जितना संकुचित होता है, मनुष्य उतना ही बद्ध और चिन्तित होता है। स्पृहा की परिधि जितनी विशाल और व्यापक होती जाती है, मनुष्य उतना ही निर्बाध और चिन्ता रहित होता जाता है। रुके हुए जल में दुर्गन्धि आती है; प्रवाहित जल दुर्गन्धिरहित होता है। पोखर में रुका हुआ जल ही सड़ सूख नहीं जाता अपि तु सागर में रुका हुआ जल भी क्षारयुक्त, दुर्गन्धित और अपेय होता है। परन्तु पोखर और सागर का जल वाष्प् बनकर आकाश में व्याप जाता है और मेघ बनकर सर्वत्र बरसता है तो वह रोगनाशक, स्वास्थ्यप्रद और अमृत बन जाता है। जिन कूपों में प्रवाहित स्रोतों का जल आता रहता है उनका जल जीवनप्रद होता है। जिन कूपों में वर्षा का जल रुक जाता है उनका जल उतना अच्छा नहीं होता। गुहा, गृह, ग्राम और नगर में रुका हुआ पवन भी दुर्गन्धित और रोगकारक होता है।

ससीम स्पृहा वह परिधि है जो मनुष्य को चिन्तारूपी दुर्गन्धि से दुर्गन्धित, और मोहरूपी क्षार से क्षारित बना देती है। यदि दुर्गन्धि और क्षार से रहित रहना है तो अपनी स्पृहा को व्यापक बनाइए। व्यापक स्पृहा का नाम ही निःस्पृहता है। स्पृहा को परिधिरहित कर दीजिए, आप निःस्पृह हो जाएंगे। अपनी स्पृहा को विश्वव्यापी बनाइए। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र- सबकी, मनुष्यमात्र की मंगलकामना और हितसाधना कीजिए और मनुष्यमात्र के प्रिय बनिए। प्राणिमात्र के हितचिन्तक और सेवाकारी बनकर, प्राणिमात्र के परम प्यारे बनिए। आप पर जिसकी भी दृष्टि पडे़ वही आपसे प्रेम करे। जो सबका है वह निःस्पृह है। जो निःस्पृह है वह निश्चिन्त है। जो निश्चिन्त है वह स्थिर और शान्त है। जो स्थिर और शान्त है वह धीर है।

(मा) मुझे (देवेषु) ब्राह्मणों में (प्रियम्) प्यारा (कृणु) कर। (मा) मुझे (राजसु) क्षत्रियों में, (उत) तथा (शूद्रे) शूद्र वर्ग में, (उत) तथा (अर्ये) वैश्य वर्ग में (प्रियम) प्यारा (कृणु) बना। मुझे (सर्वस्य पश्यतः) सब देखने वाले का (प्रियम्) प्रिय बना।



निर्लेपता

स्वामी विद्यानंद जी 'विदेह'

कुर्वन्नेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।

यजुर्वेद ४॰.२

कर्म दो प्रकार से किए जाते हैं, १) इच्छया २) स्वभावतया। जहां इच्छा है वहां लेप है। इच्छापूर्वक किए गए कर्म में फलाकांक्षा अन्तर्निहित होती है। जहां फलाकांक्षा है वहां लेपता है। फलाकांक्षा जितनी तीव्र होगी, कर्मलेप भी उतना ही दीर्घसूत्री होगा। स्वभावज कर्म में न इच्छा होती है, न फलाकांक्षा, न कर्मलेपता। इच्छा से किए कर्म में वह महत्त्व भी नहीं होता जो महत्त्व स्वभाव से किए कर्म में होती है।

शरीर में सबसे अधिक महत्त्व का कार्य प्राण का संचालन है जो स्वभावतः ही होता रहता है। यदि कहीं प्राणसंचालन का कार्य इच्छा पर आधारित होता तो जीवन रह ही न सकता। प्राण के अतिरिक्त अन्य समस्त इन्द्रियों के व्यापार का आधार इच्छा है। प्रत्येक इन्द्रिय इच्छा से प्रेरित होकर कार्य करती है। प्राण स्वभावतः चलता है। प्रत्येक इन्द्रिय थकती है और विश्राम करती है। प्राण अनथकतया निरन्तर कर्म करता है और विश्राम नहीं लेता। प्राण विश्राम करने लगे तो जीवन ही समाप्त हो जाए। प्रत्येक इन्द्रिय का एक विषय है, और प्रत्येक इन्द्रिय अपने-अपने विषय में लिप्त है। प्राण का कोई विषय नहीं। प्राण निर्विषय है। प्राण किसी विषय की ओर अनुधावन नहीं करता। प्राण किसी विषय में लिप्त नहीं। प्राण केवल शुभ ही करता है और कर्तव्य के लिए ही कर्म करता है। प्राण निर्लेप है।

कर्म सृष्टि का धर्म है। कर्म का त्याग असम्भव है। गतिशील संसार में गतिविहीन होना सम्भव ही नहीं। गतिपूर्ण संसार में निश्चेष्टता का क्या काम। कर्म तो करना ही होगा। प्रथम, इच्छापूर्वक कर्मशोध कीजिए। तत्परता के साथ अशुभ कर्मों  के त्याग तथा शुभ कर्मों के सम्पादन का अभ्यास कीजिए। ऐसा करते करते आपसे अशुभ कर्मों का सर्वथा त्याग हो जाएगा, और आपसे शुभ ही कर्म हुआ करेंगे। शुभ ही शुभ कर्म करते करते, आपका शुभ ही कर्म करने का अभ्यास वा स्वभाव हो जाएगा। तब आप केवल कर्तव्य के लिए कर्म करेंगे और स्वभावतया ही शुभ कर्म करने लगेंगे। कर्तव्य के लिए कर्म कीजिए; कर्तव्य का स्वभावतया पालन कीजिए। कर्तव्य के लिए शुभ कार्य कीजिए; शुभ कर्म करने का स्वभाव बना लीजिए। स्वभाव से कर्तव्य और शुभ सम्पादन करने का अभ्यास सिद्ध होते ही आप निर्लेप हो जाएंगे।

अनासक्ति और निर्लेपता में भेद है। ‘अनासक्ति’ का अर्थ है भोगों में त्यागभाव। ‘निर्लेपता’ का अर्थ है कर्मों में त्यागभाव। त्यागभाव से भोगना अनासक्ति है, और त्यागभाव से, स्वभाव से कर्तव्य कर्म करना निर्लेपता है। अनासक्ति और निर्लेपता की सिद्धि होने पर समस्त ग्रन्थियां छिन्न-भिन्न हो जाएंगी, समस्त आवरण विलीन हो जाएंगे, और उस अजस्र, अखण्ड, अक्षय आत्मज्योत्सना का उदय होगा जिसके आलोक में सब कुछ स्पष्ट आलोकित होने लगेगा।

(इह) यहां (कर्माणि) कर्तव्य कर्मों को (कुर्वन् एव) करता हुआ ही (शतम् समाः) सौ वर्ष (जिजीविषेत्) जीने की इच्छा करे। (एवम्) इस प्रकार (त्वयि नरे) तुझ नर में (कर्म न लिप्यते) कर्म नहीं लिपता। निर्लेपता का (इतः अन्य-था) इससे भिन्न प्रकार उपाय (न अस्ति) नहीं है।


बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

अनासक्ति

स्वामी विद्यानंद जी 'विदेह'

ईशा वास्यमिदं सर्वं यत् किं च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्य स्विद् धनम्।।

यजुर्वेद ४॰.१

(इदम् सर्वम्) यह सब विश्व इसके (ईशा वास्यम्) स्वामी से वास्य-व्याप्त है। यह विश्व स्वामीविहीन {लावारिस} नहीं है। इसका एक ईश {स्वामी} है और वह इस सम्पूर्ण विश्व में सर्वत्र समाया हुआ है। यह अखिल विश्व उसी एक सर्वव्यापक स्वामी का है। जब यह सारा जगत् उसका है तो फिर इस (जगत्याम्) जगती में (यत् किम् च) जो कुछ भी (जगत्) जगत् है, चर, अचर, जो कुछ है यह सब भी उसी का है। जगती का स्वामी, वह जगतीश इस सम्पूर्ण जगत् का अन्दर, बाहर, सर्वत्र अधिष्ठातृत्व कर रहा है।

यहां जो कुछ है वह सब उस जगतीश का ही है, तेरा कुछ नहीं। (तेन) तेन कारणेन, अतः (त्यक्तेन) त्याग के साथ, त्यागभाव से (भुंजीथाः) भोग। ‘मा भुंजीथाः’, मत भोग, वेद ऐसा नहीं कहता है। वेद ऐसी अप्राकृत बात कह ही नहीं सकता। जीवन भोगाश्रित है। भोग तो शरीर का धर्म है, प्रकृति का नियम है। भोगों का त्याग असम्भव है। इसीलिए वेद कहता है। (भुजीथाः) भोग, परन्तु (त्यक्तेन) त्यागभाव से भोग क्योंकि अ-निज को त्यागभाव से ही भोगना चाहिए।

क्या कोई भी प्राणी अथवा पदार्थ ऐसा है जो सदा से तेरे साथ हो और सदा तेरे साथ रहेगा ? जीवनपथ पर चलते हुए तुझे जो कुछ प्राप्त होता है वह जीते जी वा देहावसान पर त्यागना ही पडे़गा। अतः त्यागभाव से ही भोग। पराई वस्तु को जिस प्रकार भोगना चाहिए उसी प्रकार भोग। त्यागभाव से भोगने का नाम ही अनासक्ति है, विदेहता है। जो जीते जी अनासक्त है वह जीवन के उस पार पहुंचकर भी मुक्त रहता है। जो सदेह रहते हुए विदेह है वह देह त्यागने पर भी मोक्ष को प्राप्त होता है। जो इधर आसक्त है वह उधर भी बद्ध है। जो इधर मुक्त है वह उधर भी मुक्त है।

(मा गृधः) धनलोलुपता भी मत कर। (स्वित्) भला, सोच तो सही, (धनम्) जगत् का यह सब वैभव (कस्य) किसका है ? यह जगत् जिसका है, इस जगत् का सारा वैभव भी उसी का है। अतः धन की लोलुपता भी त्याग दे। धन वैभव का उपयोग भी त्यागभाव से ही कर।

बात सरल और स्पष्ट है जो तेरा नहीं है उसे अपना मत समझ। बस, इतनी सी बात है, जिसे जानने, मानने और समझने पर तू सर्वथा अनासक्त और जीवन्मुक्त विदेह हो जाएगा।

पवित्रता-भाग दो

स्वामी विद्यानंद जी 'विदेह'
पवित्रता का महत्त्व प्रत्यक्ष है। शुद्धता की महिमा अकथनीय है। पवित्रता और शुद्धता का बड़ा माहात्म्य है। शुद्धता में सौन्दर्य है, रोचकता है, सुरुचि है। पवित्रता में अद्भुत आकर्षण  है। शुद्धता मनमोहिनी है। पवित्रता परम मोहिका है। शुद्धता परम श्रद्धास्पद है। शुद्धता में स्फुरण है, पवित्रता में प्रस्फुरण है। शुद्धता में, पवित्रता में चरम माधुर्य है और परम प्रियता है। शुद्ध गेह, शुद्ध देह, शुद्ध नगर, शुद्ध ग्राम, शुद्ध वस्त्र, शुद्ध आभूषण, सब बडे़ प्रिय और दर्शनीय प्रतीत होते हैं। सब, जो शुद्ध है, मनोरम है।

शुद्धता में ही रूपख्याति है। शुद्ध जल में, पवित्र दर्पण में, निर्मल घृत में ही स्व, पर रूप की प्रतीति होती है। पवित्र अन्तःकरण में ही आत्मसाक्षात्कार होता है। पवित्र अन्तःकरण में ही ब्रह्मानुभूति होती है।

पवित्रता ही धर्म है। पवित्रता ही मर्म है। विचारों की पवित्रता का ही नाम अहिंसा है। वाणी की पवित्रता का ही नाम सत्य है। भावनाओं की पवित्रता का ही नाम अस्तेय है। जननेन्द्रिय की पवित्रता का ही नाम ब्रह्मचर्य है। परिग्रह की पवित्रता का ही नाम अपरिग्रह है। देह की पवित्रता का ही नाम शौच है। वृत्तियों की पवित्रता को ही तप कहते हैं। अध्ययन की पवित्रता ही स्वाध्याय है। सत्त्व की पवित्रता ही ईश्वर-प्रणिधान है। पवित्रता ही यम है। पवित्रता ही नियम है। स्थिति {बैठने} की पवित्रता ही आसन है। प्राण की पवित्रता ही प्राणायाम है। मन की पवित्रता ही प्रत्याहार है। चिन्तन की पवित्रता ही धारणा है। मनन की पवित्रता ही ध्यान है। अन्तःकरण की पवित्रता ही समाधि है। पवित्रता ही अष्टांग योग है। चक्रों की पवित्रता ही का चक्रजागरण है।

पवित्रता में ही सर्वसम्पादन है। पवित्रता में ही सब ऋद्धियां और सिद्धियां निहित हैं। अतः तीव्रता के साथ, पूर्ण तत्परता के साथ पवित्रता की सतत साधना करते रहिए। शिर, भाल, भौं, नेत्र, कर्ण, नासिका, मुख, रसना, होठ, हनू, ग्रीवा, हस्त, स्कन्ध, वक्ष, पृष्ठ, जाठर, नितम्ब, मूल-मलेन्द्रिय, जंघा, पाद, सबको परम पवित्र बनाइए और सदा पवित्र रखिए। मेधा, बुद्धि, हृदय, मन और चित्त को परम पवित्र कीजिए और सदा पवित्र रखिए। पवित्रता के सम्पादन से योगसिद्धि सहजतया उपलब्ध हो जाती है। पूर्ण पवित्रता के बिना योग-सिद्धि असम्भव है। पवित्रता ही प्रजा है। पवित्रता ही योग है।

देव जनों, दिव्य जनों की संगति से जीवन की पवित्रता सम्पादन कीजिए। मननशीलों की संगति से बुद्धि और ध्यान की पवित्रता प्राप्त कीजिए। सब पंच भूतों की संगति से प्रकृति- विहार द्वारा पवित्रता लाभ कीजिए। पवमान {पवित्र भगवान्} की संगति से पवित्रता संचारित कीजिए। अन्दर बाहर से उभयतः, सर्वथा शुद्ध, पवित्र हो जाइए।

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

पवित्रता भाग-एक

स्वामी विद्यानंद जी विदेह 

पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनवो धियाः।
पुनन्तु विश्वा भूतानि पवमानः पुनातु मा।। 

अथर्ववेद ६.१९.१

एक कटोरे में पवित्र जल भरकर रख दीजिए। उस कटोरे में सूर्य के दर्शन हो सकते हैं, उसमें चन्द्रमा के दर्शन कर सकते हैं, उसमें अपने रूप का अवलोकन किया जा सकता है। उस कटोरे में थोड़ी सी मिट्टी घोल दीजिए। अब न सूर्य के दर्शन हो सकते हैं, न चन्द्र के, न अपने रूप के। एक शुद्ध दर्पण ले लीजिए। उसमें स्व, पर का साक्षात्कार हो सकता है। दर्पण पर थोड़ी सी मिट्टी थोप दीजिए। अब कुछ भी प्रतिबिम्बित नहीं होगा।

प्रार्थना कीजिए, प्रयत्न कीजिए, कामना कीजिए कि (देवजनाः) दिव्य जन (मा) मुझे (पुनन्तु) पवित्र करें। (मनवः) मननशील जन मुझे (पुनन्तु) पवित्र करें। किस प्रकार ? (धिया) धारणा द्वारा, बुद्धि द्वारा, सुमति द्वारा। (विश्वा) सब (भूतानि) भूत, प्राणी मुझे (पुनन्तु) पवित्र करें (पवमानः) पवित्र प्रभु (मा) मुझे (पुनातु) पवित्र करे।

बुद्धि की निर्मलता से कर्मों की पवित्रता स्वतः सिद्ध हो जाती है। विचार और कर्मों की पवित्रता से भावनाएं शुद्ध होती हैं। भावनाओं की शुद्धि से हृदय, मन, चित्त तथा सत्त्व की शुद्धि होती है। इस प्रकार, जब अन्तःकरण की शुद्ध और पवित्र हो जाता है तब अनायास ही आत्मानुवेदन और ब्रह्मानुभूति की प्रतीति होने लगती है। अन्तःकरण की शुद्धि से समस्त इन्द्रियों के व्यवहार स्वतः ही शुद्ध हो जाते हैं, और कर्मों की पवित्रता भी सम्पादन हो जाती है।

पवित्रता के सम्पादन में दिव्य जनों तथा मननशील व्यक्तियों की संगति बड़ी लाभदायक होती है। दिव्य जनों तथा मननशीलों के सत्संग से बुद्धि का परिष्कार होता है। बुद्धि के परिष्कार से सब भूत पवित्रता प्रदान करने लगते हैं। पवित्र बुद्धि से दृष्टि पवित्र होती है। पवित्र दृष्टि से भूतमात्र {पंचभूत तथा प्राणी} में पवित्रता अनुभव होती है। जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। पवित्र दृष्टि, पवित्र सृष्टि। विकृत दृष्टि, विकृत सृष्टि। पवित्र दृष्टि से कण-कण, अणु-अणु और बिन्दु-बिन्दु में, पवमान की पवमानी पवित्रता के, सुन्दर सौन्दर्य के दर्शन होते हैं।

अपने वातावरण को पवित्र बनाइए, तथा अपने अन्दर और बाहर से सर्वथा शुद्ध हो जाइए। अन्तःकरण विमल हो, इन्द्रिया शुद्ध, पवित्र हों। सब करण, उपकरण सर्वथा शुद्ध हों। देह शुद्ध हो। गेह शुद्ध हो। वस्त्र शुद्ध हों। खान-पान शुद्ध हो। सब ओर से, सब प्रकार से सदा सर्वत्र, शुद्धता और पवित्रता का सुसम्पादन कीजिये।
शुद्धता में सम्पूर्ण ऋद्धियां तथा सिद्धियां निहित हैं। पवित्रता ही परम सौन्दर्य है। पवित्रता में ही पवमान का सौन्दर्य उद्बुद्ध होता है। पवमान की आराधना और उपासना से पूर्ण पवित्रता प्राप्त होती है। पुनः-पुनः गाइए:

‘पवमानः पुनातु मा।’

‘पवमान मुझे पवित्र करे, पवमान मुझे सदा पवित्र रखे।’

श्रद्धा

स्वामी विद्यानंद जी 'विदेह'

श्रद्धां देवा यजमाना वायुगोपा उपासते।
श्रद्धा हृदय्ययाकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु।।

ऋग्वेद १॰.१५१.४

श्रद्धा=श्रत्+धा,
     सत्य+धारणा,
     सत्य+धारण,
     आत्म+विश्वास।
सहज विश्वास अथवा अन्धविश्वास का नाम श्रद्धा नहीं है। सत्य को निश्चयपूर्वक जानकर, उसे दृढ़ता के साथ धारण करना श्रद्धा है। सत्य धारणा अथवा निष्ठा के साथ, अभीष्ट की साधना में लगे रहना  श्रद्धा है। आत्मविश्वास के साथ साध्य की साधना में जुट जाना श्रद्धा है। हृदयसंकल्प के साथ लक्ष्य की ओर प्रवृत्त रहना श्रद्धा है। हृदय की गहन भावना के साथ साधना करना श्रद्धा है।

देव श्रद्धा द्वारा ही देवत्व को प्राप्त होते हैं। यज्ञानुष्ठानी श्रद्धा द्वारा ही यज्ञफल {सुखैश्वर्य} प्राप्त करते हैं। यज्ञशील श्रद्धा द्वारा ही श्रेष्ठतम कर्मों की साध में निरत रहते हैं। वीर श्रद्धा द्वारा ही विजयलाभ  करते हैं। योगी भी श्रद्धा द्वारा ही योगसाधना में सिद्धि प्राप्त करते हैं। हृदयसंकल्प में ही श्रद्धा का निवास है। निस्सन्देह हृदय की भावना ही श्रद्धा है।

श्रद्धा से प्रत्येक धन प्राप्त होता है। श्रद्धावान् किसी भी ऐश्वर्य को प्राप्त कर सकता है।

श्रद्धा के साथ, दृढ़संकल्प और निश्चय के साथ योगपथ पर आरूढ़ हूजिए; आप बहुत शीघ्र सफल होंगे। विश्वास रखिए और प्रसन्नता के साथ योगानुष्ठान प्रारम्भ कीजिए।

(देवाः) देवजन, (यजमानाः) यज्ञानुष्ठानी, यज्ञशील जन और (वायु-गोपाः) प्राणरक्षक जन (हृदय्यया आकूत्या) हृदय भावना द्वारा (श्रद्धाम् श्रद्धाम्) अभीष्ट को प्राप्त कराने वाली श्रद्धा को (उपासते) उपासते हैं। वे (श्रद्धया) श्रद्धा से ही (वसु) धन, अभीष्ट (विन्दते) प्राप्त करते हैं।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

आकांक्षा

स्वामी विद्यानंद जी ,विदेह,
यदग्ने स्यामहं त्वं त्वं वा घा स्या अहम्।
स्युष्टे सत्या इहाशिषः।। 
ऋग्वेद ८.४४.२३

आकांक्षा योग की पुरोगवी है। मनुष्य उसी की प्राप्ति के लिए यत्नशील होता है जिसकी उसे आकांक्षा होती है। योग की सिद्धि का आधार आकांक्षा ही है। जब योग की, प्रभुमिलन की तीव्र आकांक्षा होती है तभी ब्रह्मप्राप्ति के साधनों की ओर प्रवृत्ति होती है। आकांक्षा जितनी तीव्र होती है उतनी ही शीघ्र उसे योग में सिद्धि प्राप्त होती है।
एक रूप-लावण्यमयी परम सुन्दरी समस्त शृंगारों से सुशोभित और सम्पूर्ण सुखसाधनों से सुसम्पन्न होकर भी गहन वेदना और अन्तःव्यथा से व्यथित रहती है, यदि उस पतिपरायणा को अपने पति का योग-सुमिलन प्राप्त नहीं है। दूसरी ओर एक अन्य सुन्दरी है जिसके पास न शृंगार की कोई वस्तु है, न कोई सुख के विशेष साधन हैं, पर उसे अपने प्राणप्रिय पति का संयोग प्राप्त है। पूर्व-सुन्दरी की अपेक्षा अवर-सुन्दरी कहीं अधिक सुखी है। इस संसार में अनेक सुखराशियां हैं, अनेक शोभन शृंगार हैं, अनेक सुखोपभोग हैं, पर प्रेमी के लिए वे सब िवधवा के शृंगार के समान निस्सार हैं, यदि उसे अपने सत्पति की सुसंगति प्राप्त नहीं है।
दो के मिलन में बड़ा सुख है। दो के मिलन में अपार और अकथनीय शान्ति मिलती है। जलबिन्दु सागर से संगत होकर सागर बन जाता है, सुखसागर हो जाता है। पति पत्नी के आत्ममिलन में, बन्धु के स्नेलसंयोग में, सखा सखा के सुमिलन में कैसी अवर्णनीय अभितुष्टि प्राप्त होती है! आत्मा भी अपने आनन्दस्वरूप  ब्रह्मसखा से मिलकर ही आनन्दी होता है। जो उसे प्राप्त कर लेता है वह आनन्दी होता है। जो उससे संगत हो जाता है, संसार की समस्त सुखराशियां, निस्सन्देह, उसी को मुबारिक होती हैं। जिसे उसका सुमिलन प्राप्त हो जाता है वही सच्चा सौभाग्यशाली है। परन्तु कितने हैं जो उससे संगत होने के लिए आतुर हैं ? मानव उससे प्रजा, सुख, वैभव और ऐश्वर्य तो मांगते हैं, पर कितने हैं जो उससे उसी को मांगते हैं ? यदि आप उससे संगत होना चाहते हैं तो उसके सुमिलन के लिए आतुर, आकुल, व्याकुल और विह्वल हूजिए। जब आप उससे मिलने के लिए आतुर हो उठेंगे तब आपको उससे साक्षात्कार के बिना, ये सरस प्रतीत होनेवाली, मायामयी मोहकताएं नीरस प्रतीत होने लगेंगी, और जब तक आप उससे संगत न हो लेंगे तब तक आप न विराम लेंगे, न विश्राम।
(अग्ने) कमनीय देव ! (यत्) काश (अहम् त्वम् स्याम्) मैं तू हो जाऊँ, तुझसे संगत हो जाऊँ, (वा) या (त्वम् घ अहम् स्याः) तू ही मैं हो जाए, तू ही मुझमें प्रकाशित-प्रज्वलित हो जाए तो (इह) यहाँ, इस जीवन में (ते आशिषः) तेरी आशिषें (सत्याः स्युः) सत्य हो जाएं।

आत्म-अवस्थिति वैदिक योग पद्धति

स्वामी विद्यानंद जी 'विदेह'
संस्थापक-वेद संस्थान 

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्।
ओं क्रतो स्मर। क्लिबे स्मर। कृतं स्मर।। यजुर्वेद ४॰.१५।।

(वायुः) प्रेरक, शरीर का संचालक, आत्मा (अन्-इलम्) अपार्थिव, अभौतिक; अतः (अ-मृतम्) अमृत, अमरणधर्मा है। आत्मा अनादि, अनन्त है। न इसका कभी आदि हुआ, न इसका कभी अन्त होगा। आत्मा स्वरूप से अजर, अमर, शुद्ध और बुद्ध है। इसे न पवन सुखा सकता है, न जल गला सकता है, न पावक जला सकता है, न मृत्यु मार सकती है। (इदम्) यह (भस्म-अन्तम्) भस्म में अन्त होने वाला, मरने वाला (अथ) तो (शरीरम्) शरीर है, केवल शरीर है। प्रत्येक आत्मा की अपनी एक स्वतन्त्र सत्ता है। आत्मा आत्मरूप से न किसी का पिता है, न पुत्र; न माता है, न पुत्री; न बन्धु है, न भ्राता; न बहिन है, न भाई; न मित्र है न सखा। ये सब सांसारिक रिश्ते-नाते केवल शरीर के हैं और शरीर के साथ हैं। शरीर का अन्त होते ही सब सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं।
अत सातत्यगमने। जीव सतत गति करनेवाला होने से आत्मा कहाता है। शरीर का गमयिता, प्रेरक, संचालक यह आत्मा ही है। अहंकार के साथ जो यह कहता है, ‘मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा चित्त, मेरे नेत्र, मेरे श्रोत्र, मेरी भुजा, मेरा पग, मेरा हृदय, वही इन्दियों का स्वामी इन्द्र-आत्मा है।
प्रकृति सत् है। आत्मा सत्, चित् {सच्चित्} है। देह कि स्थिति {शरीर सुख} के लिए आत्मा को प्रकृति का, और आनन्द के लिए परमात्मा का आश्रय लेना चाहिए।
आत्मा कर्ता तो है, पर केवल संचालक, प्रेरक वा चेतन रूप से। क्रियात्मक रूप से कर्म करने वाला भी शरीर ही है। कर्म को मूर्त रूप देने वाली तो शरीर की इन्द्रियां ही हैं। पितृधर्म, मातृधर्म, पुत्रधर्म, राष्ट्रधर्म, पतिधर्म, पत्नीधर्म अथवा पिता का कर्तव्य, माता का कर्तव्य, पुत्र का कर्तव्य इत्यादि, ये सब शरीर की ही अपेक्षा से हैं। सांसारिक सब सम्बन्ध और कर्म देह की अपेक्षा से ही हैं, आत्मा की अपेक्षा से नहीं।
आत्मरूप से आत्मा का शाश्वत सम्बन्ध तो एकमात्र परमात्मा से, केवल ब्रह्म से है। अतः (क्रतो) कर्तः! आत्मन! तू सदा (ओम् स्मर) ओं का स्मरण कर। सदा ओं से संयुक्त और संजुष्ट रह। सब कर्म कर, सक कार्य कर, सक सब कर्तव्य निर्वाह कर, (कृतम् स्मर) कर्तव्य कर्म और लक्ष्य का ध्यान रख, पर अपने अनिल और अमर स्वरूप को नितरां अभिलक्ष्य रखते हुए। ओं और कृत का स्मरण किसलिए ? (क्लिबे) क्लैव्य के निवारण के लिए, आत्मसंबल, आत्मस्थिति, आत्मनिश्चलता, आत्म-अवस्थिति के लिए।
दर्पण में स्वरूप के दर्शन तभी होते हैं जब दर्पण शुद्ध भी हो और स्थिर भी। जल में तभी स्वरूप के दर्शन होते हैं जब जल स्वच्छ भी हो और साथ ही, तरंगरहित अथवा स्थिर भी हो। आत्म-अवस्थिति और ब्रह्मसाक्षात्कार के लिए अन्तःकरण की विमलता की भी परम आवश्यकता है। केवल पवित्रता से काम न चलेगा, पवित्रता के साथ निश्चलता भी चाहिए।
ऐसा अभ्यास कीजिए कि किन्हीं भी अवस्थाओं और परिस्थितियों में आप सदा शान्त, स्थिर और निश्चल रह सकें। निश्चलता की दृढ़भूमिता के लिए आप सदा यह याद रखिएः
॰१. (वायुः) आत्मा (अनिलम्, अमृतम्) अजन्मा और अमर है।
॰२. (अथ) और (इदम् शरीरम्) यह शरीर (भस्मान्तम्) नश्वर है।
॰३. (क्रतो) आत्मन्! (ओम् स्मर) ओं का स्मरण रख।
॰४. (क्लिबे) आत्मस्थिति के लिए {उपर्युक्त तथ्यों को} (स्मर) रमरण रख।
॰५. (कृतम्) कृत, लक्ष्य किए हुए को (स्मर) स्मरण रख। कितनी साध सिद्ध हो चुकी,
    कितनी शेष है, यह सदा ध्यान में रख।

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

वैदिक योग पद्धति ईशविश्वास ।।१।।


स्वामी विद्यानंद जी विदेह 
संस्थापक वेद-संस्थान, अजमेर
राजस्थान
ईशविश्वास ।।१।।

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाष्वतीभ्यः समाभ्यः  ।।यजुर्वेद ४॰.८।।

ईश है। (सः परि अगात्) वह सर्वत्र रम रहा है। (सः शु¬क्रम्) वह सर्वशक्तिमान् है। (सः अकायम्) वह निराकार है। (सः अव्रणम्) वह रोगरहित है। (सः अस्नाविरम्) वह अस्नायु है। (सः शुद्धम्) वह शुद्ध है। (सः अपापविद्धम्) वह निष्पाप है। (सः कविः) वह क्रान्तदर्शी है। (सः मनीषी) वह परम प्राज्ञ है। (सः परिभूः) वह परिपूर्ण है। (सः स्वयम्भूः) वह स्वयम्भू है। वही (शाश्वतीभ्यः समाभ्यः) शाश्वत प्रजाओं आत्माओं के लिए (अर्थान्) अर्थों, पदार्थों, भोग्यों को (याथातथ्यतः) यथावत् (वि अदधात्) निर्धारण/समुत्पन्न किया करता है।

अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद् देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्।
तद् धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिष्वा दधाति।। यजुर्वेद ४॰.४।।

ईश है। वह (एकम्) एक है, (एन्-एजत्) निर्गत-कूटस्थ है, (मनसः जवीयः) मन से अधिक वेगवान् है; मन की वहाँ पहुंच नहीं है। (न) न (देवाः) इन्द्रियदेव ही (एनत्) इसको (आप्नुवत्) पाते हैं। (तत् पूर्वम् अर्षत् तिष्ठत्) वह पूर्व-गामी, कूटस्थ (धावतः अन्यान्) अन्य दौड़ते हुओं को (अति एति) लांघ रहा है। (तस्मिन्) उसी में (मातरिश्वा) आत्मा, अन्तरिक्ष (अपः) कर्मों-कर्मफलों, लोकों को (दधाति) धारण करता है।

तदेजति तन्नैजति तद् दूरे तद्वन्तिके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः।। यजुर्वेद ४॰.५।।

ईश है। (तत्) वह (एजति) विश्व का संचालन करता है। (तत्) वह स्वयं (न एजति) स्थानान्तर नहीं होता है। (दूरे) दूर स्थान में भी (तत्) वह है। (तत् उ) वह ही (अन्तिके) समीप में भी है। (तत्) वह (अस्य सर्वस्य) इस सबके (अन्तः) अन्दर है। (तत् उ) वह ही (अस्य सर्वस्य बाह्यतः) इस सबके बाहर भी है।

विश्वास रखिए, ‘ईश है, और उसका साक्षात्कार होगा।’