गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

नया संसार

आध्यात्मिक चिन्तन के क्षण..............
आचार्य सत्यजित् जी  ऋषि उद्यान, अजमेर (राजस्थान)

प्रभु की कृपा से संसार में हमें इस बार मनुष्य शरीर मिला है। संसार में अनेक प्रकार के छोटे-बड़े, उच्च-निम्न स्तर के शरीर हैं। मूलतः यह संसार सब आत्माओं के लिए एक जैसा होते हुए भी शरीर, साधनादि के भेद से एक जैसा नहीं रह पाता। गायों का संसार अलग है, चींटियों का संसार अलग है, मछलियों-पक्षियों का अलग है और मनुष्यों का अलग है।
जन्म लेते ही हम संसार को स्पर्श, शब्द, रूप आदि विषयों के रूप में जानने लगते हैं। समय के साथ हमारे अच्छे-बुरे, खट्टे-मीठे-कड़वे अनुभव बनते जाते हैं और इससे हमारा संपर्क व व्यवहार अपना-अपना एक संसार बन जाता है। हमारा संपर्क व व्यवहार जिनके साथ होता जाता है, वे हमारे संसार में जुड़ते जाते हैं। जिनसे हमारा संपर्क व व्यवहार कम होते-होते छूट जाता है, वे हमारे संसार से बाहर हो जाते हैं। हमारा अपना-अपना एक अलग संसार है। हमारे सुख-दुःख, हानि-लाभ, हित-अहित इनसे जुड़े रहते हैं। यह हमारा अपना-अपना बाह्य-संसार है।
बाह्य-संसार से भिन्न हमारा अपना-अपना आन्तरिक-संसार भी होता है; मानसिक स्तर पर, वैचारिक स्तर पर, ज्ञान के स्तर पर। हमारे बाह्य-संसार में परस्पर जितनी भिन्नताएं हैं, उससे बहुत अधिक भिन्नताएं आन्तरिक-संसार में होती हैं। लगभग समान बाह्य-संसार मे रहने व व्यवहार करने वालों के भी आन्तरिक-संसार परस्पर अति भिन्न व नितान्त विपरीत हो सकते हैं। सबका अपना-अपना सोच है, अपने-अपने विचार हैं, अपना-अपना ज्ञान है, अपना-अपना दृष्टिकोण है, जीवन के लक्ष्य भिन्न-भिन्न बने हुए हैं। हमारा यह आन्तरिक-संसार अन्यों से विलक्षण होता है। इसमें हमारे पूर्वजन्म के संस्कारों की भिन्नता भी कारण बनती है।
बाह्य-संसार भी हमारा अपना-अपना है व आन्तरिक-संसार भी हमारा अपना-अपना है। बाह्य-संसार की अपेक्षा आन्तरिक-संसार हमारा अधिक अपना होता है, हमारा अधिक निजी होता है, हमारा अधिक आत्मीय होता है, हमारा अधिक व्यक्तिगत होता है, हमें वह अधिक प्रतीत भी होता है। हमारे बाह्य-संसार को अधिक लोग जानते हैं, अधिक लोग उससे परिचित रहते हैं। हमारे आन्तरिक-संसार को कम लोग जानते हैं, कम लोग उससे परिचित रहते हैं। बाह्य-संसार में हम कम वस्तुएं छुपा कर रख सकते हैं। आन्तरिक-संसार में बहुत कुछ छुपा कर रख सकते हैं, बहुत कुछ छुपा कर रखते हैं, अनेक बातों की दूसरों को भनक तक नहीं लगने देते।
हमारे बाह्य व आन्तरिक संसार भिन्न-भिन्न होते हैं, किन्तु ये एक-दूसरे को प्रभावित करते रहते हैं। ये एक दूसरे को बहुत प्रभावित करते हैं। कभी-कभी तो इतना प्रभावित कर देते हैं कि जैसा हमारा बाह्य-संसार होता है, वैसा ही आन्तरिक-संसार बन जाता है अथवा जैसा हमारा आन्तरिक-संसार होता है, वैसा ही बाह्य-संसार बन जाता है। ये परस्पर इतना प्रभावित करने लगते हैं कि उसके दुष्प्रभाव को रोक पाना हमें असंभव प्रतीत होने लगता है। हमारे बाह्य-संसार को व्यक्ति-वस्तु-परिस्थिति अधिक प्रभावित करते हैं, उन पर हमारा नियन्त्रण अपेक्षाकृत कम रहता है। हमारे आन्तरिक-संसार को अन्य व्यक्ति-वस्तु-परिस्थिति अपेक्षाकृत कम प्रभावित करते हैं, उसमें अन्यों का दखल-हस्तक्षेप कम रहता है।
प्रभु की कृपा है कि हमारा बाह्य-संसार जो भी हो, जैसा भी हो, पुनरपि हम अपने आन्तरिक-संसार को भिन्न रूप में रख सकते हैं। बाह्य-संसार को बदलने में हमारी स्वतनन्त्रता बहुत कम है, जबकि आन्तरिक-संसार को बदलने में हमारी स्वतन्त्रता बहुत अधिक है। प्रभु-कृपा से हम योग-साधना द्वारा बाह्य-संसार से निरपेक्ष, स्वतन्त्र, एक बिलकुल नया आन्तरिक-संसार रच सकते हैं। ऐसा आन्तरिक-संसार जिसमें सब कुछ हमारी इच्छा वाला हो, जितना व जैसा पवित्र उसे बनाना चाहें, बना सकते हैं। दूसरों के अनावश्यक व अनधिकृत हस्तक्षेप से बहुत दूर; बाह्य-संसार की दुरवस्था, गंदगी, अशान्ति से बहुत दूर; एक सुव्यवस्थित, शुद्ध व शान्त संसार बना कर उसमें रह सकते हैं।
आन्तरिक-संसार एक भिन्न संसार है। योग-साधना से रहित व्यक्तियों का यह आन्तरिक-संसार उनके लिए अत्यन्त दुःख-बाधा-समस्या व पतन का कारण बन जाता है। प्रभुभक्त योग साधकों का आन्तरिक-संसार उनके लिए अत्यन्त सुख-अनुकूलता-शान्ति- समाधान व उन्नति का आधार बन जाता है। प्रभु की कृपा सदा साथ है। हमें अपना नया आन्तरिक-संसार बनाना है, वहीं आत्म-दर्शन व प्रभुदर्शन भी होंगे।

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

भारतीय प्राचीन राजनीति (2)

ओ३म्
इतिहास शोधक, गवेषक स्वर्गीय श्री पण्डित भगवद्दत्त जी

    अब संसार के इतर देशों की व्यवस्था सुनिए। पहले सारे संसार में स्वायम्भुव मनु-प्रोक्त राजशास्त्र तथा वैवस्वत मनु द्वारा उसका रूपान्तर ही अधिकतर प्रयुक्त होता था। पुनः ब्राह्मणों के अभाव में योरुप और मिश्र आदि देश विद्याहीन हुए। तब कालडिया में हमूरब्बी का, और इबरानी लोगों में मूसा का नियम प्रचलित हुआ। इन दोनों के नियम भी मनु के नियमों का विकृत और अधूरा रूप थे।

    यूनान अथवा यवन देश में सब से प्रथम अफलातून (Plateau) ने राजशास्त्र का ग्रन्थ लिखा। इसके विषय में इंगलैण्ड के अध्यापक ई.जे. अर्विक ने एक खोज पूर्ण ग्रन्थ सन् 1920 में लन्दन से प्रकाशित कराया। उसका नाम है-

The Message of Plateau : A Reinterpretation of the republic.

इस पुस्तक के प्रारम्भ में योग्य लेखक लिखता है-

The republic is based largely upon ancient Indian social philosophy.

       अर्थात्-अफलातून का ‘जनतन्त्रराज्य ग्रन्थ’ अधिकांश में प्राचीन भारतीय वर्णाश्रम की मर्यादा पर आश्रित है।
   जिस वर्णाश्रम को आज लोग आमूलचूल मिटा देना चाहते हैं, उस पर अफलातून के ग्रन्थ का आधार है। सत्य है, मूर्ख संसार अपनी जड़ों को काट रहा है।
   
    इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि योरुप की मुहुर्मुहुः घोषित गणतन्त्र राज्यप्रणाली का उद्गम भी आर्य संस्कृति से हुआ है। प्रश्न होता है, क्या योरुप अथवा अमेरिका का कथित उन्नत मस्तिष्क मानव-कल्याण के लिए राजशास्त्रविषयक कोई उपयोगी सरल तथा उत्कृष्ट पद्धति निकाल सहा है वा नहीं ? श्रोतृवृन्द! इसका उत्तर हमारे अगले कथन में मिलेगा।
   
   परन्तु आर्य राजनीति को उसके स्वच्छ रूप में, उसके निर्मल कलेवर में समझने के लिए निम्नलिखित कतिपय मूल तत्त्वों और सत्य पर आश्रित वज्र सिद्धान्तों का ज्ञान परमावश्यक है। इसलिए पहले वे मूल सिद्धान्त लिखे जाते हैं-
   
 (1) योरुप के वर्तमान सिद्धान्त में मत (religion) और अध्यात्मविहीन (secular) को पृथक् मान लिया गया है। योरुप के प्रायः विचारक, जिन पर विकासमत की पूरी छाप है, आत्मा का तथा दैवी ज्ञान का अस्तित्व नहीं मानते। वे मनुष्यकृति में ही विश्वास रखते हैं। इसके ठीक विपरीत भारत के इतिहास में मोक्षशास्त्र को त्रिवर्गशास्त्र से पृथक् माना है, पर दोनों में आत्मिकभावना का पूर्ण समावेश स्वीकार किया है। दोनों का उद्गम वेद से और दैवी है। बौद्ध और जैन भी इनका उद्गम मनुष्य से न मानकर दैवी अर्थात् सर्वश्र तीर्थंकरों द्वारा मानते हैं।
    इसलिए यह सत्य है कि मानव-जीवन के चार उद्देश्यों में से धर्म, अर्थ काम के त्रिवर्ग को मोक्ष से पृथक् मानकर भी, हम उस अर्थ में सैक्यूलर नहीं हैं, जिस अर्थ में पण्डित जवाहर लाल जी हमें सैक्यूलर बनाना चाहते हैं। हमारा ईश्वर में, और वेद के अनादित्व में पूर्ण विश्वास है। और राजनीति वेद से चली, तथा ऋषियों द्वारा इसका स्पष्टीकरण हुआ, इस सत्य ऐतिहासिक तथ्य को परे फैंक कर हम असत्य का मार्ग ग्रहण नहीं कर सकते। हम मनुष्य-कर्तृत्व की उत्कृष्टता में विश्वास नहीं रखते।

यत् खलु शब्द आह तद् अस्माकं प्रमाणम् -व्याकरण महाभाष्य।

हम शब्दप्रमाण के माननेवाले हैं।

    (2) इसके साथ यह भी ध्यान रखने योग्य है कि कुरान और बाइबिल के समान वेद नहीं। वेद आदि सृष्टि में हुआ है, और वेद शब्द का अर्थ ज्ञान है। वेद के मन्त्र उपदेश देते हैं-मोक्ष और राजनीति का। एक लाख अध्यायों में आदि त्रिवर्गशास्त्र का ज्ञान देने वाला ब्रह्मा, जो कुरान और बाइबिल में आदम अथवा आदि देव के नाम से प्रसिद्ध है, तथा राजशास्त्र के महान् आचार्य इन्द्र, बृहस्पति, शुक्र और नारद, तथा धर्म अथवा कानून का एक लाख श्लोकों में विधान करने वाला स्वायम्भुव मनु, सब मुक्तकण्ठ से एक ही ध्वनि करते हैं-

वेदोऽखिलो धर्ममूलम्-मनु

    कोटल्य भी विद्याओं में त्रयी का प्रधान स्थान मानता है। बाइबिल आदि अधिकतर भक्ति और पूजा का मार्ग बताते हैं। अतः जब कोई वेद-विश्वासी आर्यराज्य की घोषणा करता है, तो उसे Communal अथवा मतवादी नहीं कहा जा सकता। वह सम्पूर्ण विद्याओं के भण्डार वेद की शुद्ध राज्य-पद्धति का समर्थक है। हाँ उसका आधार भ्रान्तिपूर्ण मानव-बुद्धि पर नहीं, ईश्वर के ज्ञान और ऋषियों के व्याख्यान पर हैं।

    राजशास्त्र के पूर्वोक्त उपदेष्टा ऋषियों ने राज्य, राष्ट्र, प्रजा, दण्ड, धन-विभाजन, भूमि, कर, न्याय और विधान आदि के सम्पूर्ण सिद्धान्त इस निर्मलरूप में दिए हैं कि उनकी तुलना प्लैटो, बिस्माक, डिजरेली, ग्लेडस्टन, कार्लमार्क्स, लेनिन, हिटलर, स्टैलिन, चर्चिल, रोजवेल्ट, ट्रमन अथवा जवाहरलाल आदि अणुमात्र भी नहीं कर सकते। अतः उन ऋषियों के राजशास्त्र के सिद्धान्तों द्वारा संसार को राग-द्वेष रहित करके सुखी बनाने का प्रयास करनेवाले आर्य विकृत शब्द हिन्दू से पुकारे जाने वाले श्रद्धावान् लोगों को Communal कहना अनुचित है, अज्ञान का फल है, नहीं नहीं महान् पाप है। वस्तुतः संसारमात्र में केवल आर्य ही कम्यूनल नहीं है, शेष दूसरे सारे लोग जिन्होंने अधूरे विकृत रागद्वेषयुक्त मनुष्य-निर्मित आधारों पर राजशास्त्र के सिद्धान्त अथवा विधान बनाकर अपनी-अपनी Communities (समूह) बनाई हैं, कम्यूनल हैं। आर्यराज्य में घृणा और वैमनस्य का लेश नहीं है।
    
    जिस प्रकार कम्यूनिस्ट बनने वालों को ईश्वर आत्मा पुनर्जन्म और कर्मफल के अस्तित्व के विश्वास को तिलांजलि देनी पड़ती है, तथा जिस प्रकार कम्यूनिस्ट लोग कार्लमार्क्स को ज्ञान का परम पुंज मानते हैं अपिच जिस प्रकार सोशलिस्ट बनने वाल को धन के बटवारे के सिद्धान्त-विशेष मानने पड़ते हैं और पूंजीपति और मजदूर रूपी अति घृणित शब्दों द्वारा उद्घोषित, वर्तमान-युगीन सदोषमत स्वीकार करने पड़ते हैं, अपरं च जिस प्रकार कांग्रेस में प्रवेश करने वालों को संप्रथित संस्कृति (Composite Culture) के दूषित मत में विश्वास करना पड़ता है, तथा वेद बाइबिल और कुरान वर्णित आदि-मनुष्य के जन्मविषयक सिद्धान्त का विश्वास त्याग करके श्री महात्मा गांधी जी द्वारा स्वीकृत विकासमत अपनाना पड़ता है, उसी प्रकार आर्य-राजनीति में विश्वास करने वाले को वेद को ज्ञान का मूल और सर्वांगपूर्ण उद्गम का मूल मानना पड़ता है, जो तथ्य स्वतः-सिद्ध, इतिहास-सिद्ध और तर्कसिद्ध है, तथा जिस सिद्धान्त के सम्मुख जर्मन लेखकों का मिथ्या भाषा-मत जर्जरीभूत हो रहा है, तो इसमें आर्य अथवा हिन्दू का कोई दोष नहीं। वह उसी प्रकार के वैज्ञानिक-मार्ग का पुजारी है, जिस प्रकार के वैज्ञानिक मार्ग पर एक वनस्पतिशास्त्र-वेत्ता अथवा एक रसायनशास्त्रवेत्ता चल रहा है।

    इस कथन में अत्युक्ति का लेशमात्र भी नहीं कि राजनीति के क्षेत्र में वास्तविक अधिकार आर्य का ही है, और शेष लोग तो इस विषय में बालक के समान हैं। संसार को आर्यशास्त्र से सीखने की आज भी आवश्यकता है। इस सिद्धान्त के सर्व-विदित न होने का दुःख है, पर इस विषय में दोष अपना है। हमने अभी तक एतद्विषयक उत्कृष्ट साहित्य संसार के सामने नहीं धरा। आर्यसमाज का सब धन और शक्ति अति छोटे कामों में लगी है।

    (3) तीसरा मूल तत्त्व है-ह्रास-सिद्धान्त विषयक। मानव जाति काल के सहस्रों वर्ष के महान् चक्र में, सामूहिकरूप से उन्नति की ओर नहीं गई। यह ह्रास और अवनति की ओर मुख किए है। विज्ञान के जिन महान् आविष्कारों पर वर्तमान नास्तिक संसार मुग्ध है, वे मानव के लिए कल्याणकारी सिद्ध हुए तथा होंगे वा नहीं, इस का निर्णय भावी संसार करेगा। अतः दस-बीस आविष्कारों को ही जीवन-उन्नति का सर्वे-सर्वा मानना, सब कुछ नहीं है। भगवान् मनु ने सहस्रों वर्ष पूर्व कह दिया था कि राष्ट्रों में महायन्त्रों का प्रवर्तन पतन का कारण अर्थात् उपपातक होता है-

सर्वाकरेष्वधिकारो महायन्त्रप्रवर्तनम्।
हिंसौषधीनां स्त्र्याजीवोऽभिचारो मूलकर्म च।।11-62।।

    इसलिए ज्ञात होता है कि महायन्त्रों को जानते हुए भी ऋषियों ने इनका अधिक प्रचार मनुष्य के कल्याण का हेतु नहीं माना। अतः इन पर उन्होंने नियन्त्रण कर दिया। महायन्त्रों से पाश्चात्य संसार को जो सुख हुआ है, उसका परिणाम कुछ ही वर्षों में निकलने वाला है।

    राजनीति के क्षेत्र में भी जो उन्नत दशा पूर्व समयों में थी, उस का सहस्रांश भी अब नहीं है। मैं आपको रामराज्य के विषय की कतिपय यथार्थ घटनाएँ सुनाता हूँ-

विधवा यस्य विषये नानाथाः काश्चनाभवन्।।47।।
नित्यं सुभिक्षमेवासीद् रामे राज्यं प्रशासति।।48।।
अदंशमशका देशा नष्टव्यालसरीसृपाः।
नान्योन्येन विवादोऽभूत् स्त्रीणामपि कुतो नृणाम्।
धर्मनित्याः प्रजाश्चासन् रामे राज्यं प्रशासति।।51।।
सर्वा द्रोणदुधा गावो रामे राज्यं प्रशासति।।52।।
महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 29

    अर्थात्-रामराज्य में विधवा और अनाथ नहीं थे। खाना-पीना सदा सुलभ था। सम्पूर्ण देश में मच्छर, सिंह, सर्प, कानखजूरा और बिच्छू आदि न थे। पर्वतों के निर्जन स्थानों में भले ही हों। किसी स्त्री का दूसरी स्त्री से कभी झगड़ा नहीं होता था, पुरुषों के झगड़े की तो बात ही क्या। प्रजा धर्म में स्थिर थी। अधर्मी नास्तिक तब न थे। प्रत्येक गौ न्यून से न्यून 32 सेर दूध देती थी।

    पौरव कुल के चक्रवर्ती सुहोत्र के राज्य में निर्धन से निर्धन पुरुष का बालक सोने के हाथी-घोड़े रूपी खिलौनों से खेलता था। महाभारत शान्तिपर्व में लिखा है-

यस्मै हिरण्यं ववृषे मधवा परिवत्सरम्।।29/32।।

    मैं कल्पित बातें नहीं कह रहा। सत्य इतिहास के ये नग्नचित्र हैं। भला कौनसा कम्युनिस्ट अथवा सोशलिस्ट राज्य है, जो क्रियात्मक रूप में इनके समीप भी पहुंच सकता है। अतः यदि इस प्रकार के सुखी आर्य-राज्य के निर्माण का हम यत्न करें, तो इसमें किसको आपत्ति हो सकती है ? राज्य-व्यवस्था में ऋषियों का सिद्धान्त अजेय है। रूस और अमरीका की डिण्डीभि निःसार है। वे कम्यूनल हैं, हम प्राणीमात्र के हैं।

बुधवार, 20 जनवरी 2016

भारतीय प्राचीन राजनीति (एक)

ओ३म्
भारतीय प्राचीन राजनीति (1)

इतिहास शोधक, गवेषक स्वर्गीय श्री पण्डित भगवद्दत्त जी

राजनीति को समझने के लिए, उसके जटिल सिद्धान्तों पर अपना अधिकार प्राप्त करने के लिए, और संसार आर्यवर्त्म से विचलित न हो, इसके लिए राजनीति के प्रादुर्भाव का इतिहास जानना अत्यावश्वक और अनिवार्य है। अतः प्रथम उसी पर संक्षिप्त रूप से प्रकाश डाला जाता है।
आयुर्वेदीय कायचिकित्सा के अग्निवेश तन्त्र (भारत युद्ध से 240 वर्ष पूर्व) का जा रूप, चरक- प्रति-संस्कृता (विक्रम से 3000 वर्ष पूर्व) अपूर्व आर्षसंहिता में सम्प्रति उपलब्ध है, उसके विमान स्थान, अध्याय 3 में लिखा है-
आदिकाले.............व्यपगत-भय-राग-द्वेष-मोह-लोभ-क्रोध............आलस्यपरिग्रहाश्च पुरुषाः बभुवुः अमितायुषः।............भ्रश्यति तु कृतयुगे केषांचिद् अत्यादानात् सांपन्निकानां शरीरगौरवमासीत्। शरीरगौरवाच्छ्रमः। श्रमाद् आलस्यम्। आलस्यात् संचयः। संचयात् परिग्रहः। परिग्रहाल्लोभः प्रादुरासीत्। ।।28।।
ततस्त्रेतायां लोभाद् अभिद्रोहः। अभिद्रोहाद् अनृतवचनम्।...........ततस्त्रेतायां धर्मपादोऽन्तर्धानमगमत्।..........।।29।।
कैसा सुन्दर वर्णन है। संसारमात्र के साहित्य में प्राचीनतम कालविषयक यह ऐतिहासिक तथ्य सुरक्षित नहीं है। आर्य ऋषियों का संसार पर अतुलनीय उपकार है, जो मानवपन के इतिहास का उन्होंने निष्पक्ष-चित्र उपस्थित कर दिया है।
चरक-वैशम्पायन का अभिप्राय है-
‘पहला मानव धर्मपरायण था। तत्पश्चात् आलस्य के कारण अनेक लोग संचय (Hoarding) की प्रवृत्ति वाले हो गए। संचय से ग्रहण करने की इच्छा, और परिग्रह से लोभ उत्पन्न हुआ। तब त्रेता में लोभ से द्रोह और द्रोह से असत्य-भाषण उत्पन्न हुआ।’ पुराने इतिहास का यह मुंह बोलता चित्र है।
ठीक यही तथ्य अग्निवेश के सहपाठी भगवान् पराशर की ज्योतिष-संहिता में भी सुरक्षित है। यह ग्रन्थ अब उपलब्ध नहीं, पर इस के अनेक लम्बे पाठ पुराने टीका आदि ग्रन्थों में मिलते हैं। इस पराशरतन्त्र की प्रति संस्कृता ज्योतिष-संहिता में लिखा है-
पुरा खल अपरिमित-शक्ति-प्रभा-प्रभाव-वीर्य............धर्मसत्त्वशुद्धतेजसः पुरुषा बभूवुः। तेषां क्रमाद् अपचीयमानसत्त्वानाम् उपचीयमानरजस्तमस्कानां लोभः प्रादुरभवत्। लोभात् परिग्रहम्। परिग्रहाद् गौरवम्। गौरवाद् आलस्यम्। आलस्यात् तेजाऽन्तर्दधे।
यही अनुपम ऐतिहासिक इतिवृत्त भगवान् कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास (3050 वर्ष विक्रम से पूर्व) ने महाभारत संहिता, शान्तिपर्व, अध्याय 186 में भृगु-भरद्वाज-संवाद के प्रसंग में सुरक्षित किया है-
इत्येते चतुरो वर्णा येषां ब्राह्मी सरस्वती।
विहिता ब्रह्मणा पूर्वं लोभात्त्वज्ञानतां गताः।।12।।
भीष्म उवाच
नियतस्त्वं नरश्रेष्ठ शृणु सर्वमशेषतः।
यथा राज्यं समुत्पन्नमादौ कृतयुगेऽभवत्।।13।।
नैव राज्यं न राजासीन् न दण्डो न च दाण्डिकः।
धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति च परस्परम्।।14।।
पलयानास्तथाऽन्योन्यं नरा धर्मेण भारत।
खेदं परमाजग्मुस्ततस्तान् मोह आविशत्।।15।।
ते मोहवशमापन्ना मानवा मनुजर्षभ।
प्रतिपत्ति-विमोहाच्च धर्मस्तेषामनीनशत्।।16।।
नष्टायां प्रतिपत्तौ तु मोहवश्या नरास्तदा।
लोभस्य वशमापन्नाः सर्वे भारतसत्तम।।17।।
अर्थात्-खेद के कारण अज्ञान, और बुद्धि में अज्ञान के कारण धर्मनाश तथा बुद्धिनाश से लोभ का प्रारम्भ हुआ।
इन लेखों का सार यही है कि संसार में दुःख का मूल अज्ञान, संचय और लोभ से आरम्भ हुआ। प्रवृद्ध लोभ के कारण जब मानव कृच्छ्र दशा को प्राप्त हुआ, तो उसमें मात्स्यन्याय प्रवृत्त हुआ। जिस प्रकार एक मत्स्य छोटी मच्छियों को खा लता है, उसी प्रकार सशक्त मनुष्य निर्बलों को खाने लगा। तब ऋषियों के उपदेश से राजधर्म चला, तथा वैवस्वत मनु इस सृष्टि का प्रथम राजा हुआ।
राजनीति के महापण्डित आचार्य विष्णुगुप्त कौटल्य ने लिखा है-
मात्स्यन्यायाभिभूताः प्रजाः मनुवैवस्वतं राजानं प्रचक्रिरे।
कौटल्य ने यह इतिवृत्त महाभारत शान्तिपर्व अध्याय 67 से लिया-
राजा चेन्न भवेल्लोके पृथिव्यां दण्डधारकः।
शूले मत्स्यानिवापक्ष्यान् दुर्बलान् बलवत्तराः।।16।।
अराजकाः प्रजाः पूर्वं विनुशुरिति नः श्रुतम्।
परस्परं भक्षयन्तो मत्स्या इव जले कृशम्।।17।।
ताभ्यो मनुं व्यादिदेश मनुर्नाभिननन्द ताः।।21।।
अर्थात्-मात्स्यन्याय की प्रवृत्ति पर वैवस्वत मनु प्रथम राजा चुना गया। मनु के न चाहने पर भी प्रजाओं ने उस पर राज्य भार डाल दिया।
मनु से पूर्व पृथु वैन्य अभिषिक्त हुआ था, पर वह समस्त भूमण्डल का राज नहीं था। शतपथ ब्राह्मण में लिखा है-
पृथुर्ह वै वैन्यो मनुष्याणां प्रथमोऽभिषिषिचे।।5।3।5।4।।
मुन भारत मिश्र आदि सब देशों का राजा था। मिश्र देश के पुराने ग्रन्थों में उसे मेनेस नाम से स्मरण किया है।
शतपथ से पूर्व वाल्मीकि मुनि का भी इस विषय में साक्ष्य है-
आदिराजो मनुरिव प्रजानां परिरक्षिता। ।।बालकाण्ड 6/4।।
मनु ने व्यवस्था की कि संसार में अज्ञान, संचय और लोभ का नाश होता रहे तथा बली निर्बलों को न सताएँ।
इतने वर्णन से आप समझ लेंगे कि राज्य वही श्रेष्ठ है, जहां ज्ञान का साम्राज्य रहे, जहाँ अज्ञानी न्यून हों, जहाँ संचय की प्रवृत्ति दान और त्याग के वशीभूत रहे, तथा जहाँ लोभग्रस्त पुरुष थोडे़ हों, तथा जहाँ निर्बल भी आराम और सुख का जीवन व्यतीत करें, और जहाँ चोरी डाका अपि च बलात्कार आदि कुछ न हो। अस्तु।
इस प्रकार वैवस्वत मनु के काल से भारतीय राजशास्त्र, अथवा दण्डशास्त्र तथा अर्थशास्त्र का प्रयोग वृद्धि को प्राप्त हुआ। राजशास्त्र का मूल वेद में है। भगवान् ब्रह्मा  ने वेद से आकृष्ट करके त्रिवर्ग का मूलशास्त्र एक लाख अध्याय में दिया। उसका उत्तरोत्तर संक्षेप होता गया। वैवस्वत मनु ने उस परम्परागत शास्त्र का विस्तृत प्रयोग आरम्भ किया। मनु के पश्चात् वह शास्त्र अधिक संक्षिप्त होता गया। श्री भगवान् ब्रह्मा जी के काल से भारत-युद्ध-काल तक इस राजनीति-शास्त्र के निम्नलिखित 24 प्रधान उपदेष्टा हुए-
01. ब्रह्मा                              02. स्वायम्भुव मनु                    03. प्राचेतस मनु
04. वैवस्वत मनु                 05. विशालाक्ष-शिव                    06. इन्द्र-सहस्राक्ष
07. बृहस्पति-सुरगुरु           08. काव्यउशना-शुक्र                  09. नारद-देवर्षि-पिशुन
10. बुध-राजपुत्र                  11. सुधन्वा आंगिरस                  12. मरुत आविक्षित
13. भरद्वाज बार्हस्पत्य        14. पराशर                                 15. गर्ग
16. गौरशिरा                       17. भागुरि                                  18. भीष्म-कौणपदन्त
19. द्रोण-भारद्वाज               20. कृष्ण देवकीपुत्र                     21. उद्धव मन्त्री-वातव्याधि
22. विदुर                            23. शाम्बव्य                              24. वेदव्यास कृष्ण द्वैपायन

इनके अतिरिक्त आठ धर्मसूत्रकारों ने भी न्यूनाधिक प्रसंगवश राजशास्त्र का उपदेश दिया। इनमें से पहले तीन का उपदेश कुछ विस्तार से है-
01. हारीत                           02. देवल                                    03. शंखलिखित
04. गौतम                          05. वसिष्ठ                                   06. आपस्तम्ब
07. बौधायन                       08. शौनक (राजधर्म में)
इनमें अन्तिम तीन भारत युद्ध के 200 वर्ष पश्चात् अपने धर्मसूत्र लिख रहे थे। इनके अनन्तर निम्नलिखित छः आचार्यों और पण्डितों ने राजधर्म का आर्ष उपदेश संक्षिप्त किया।
01. आम्भीय                      02. चारायण                               03. विष्णुगुप्त कौटिल्य
04. विष्णु शर्मा                   05. कामन्दक                             06. सोमदेव सूरि
इन अड़तीस महर्षियों मुनियों आचार्यों और पण्डितों के ज्ञान का जो अंश सम्प्रति उपलब्ध है, उनमें पारंगत व्यक्ति ही राजनीति के विषय में कुछ कह सकता है।

शनिवार, 9 मई 2015

01- शतपथ सुभाषित (कल की उपासना मत कर)

लेखक 
स्वर्गीय आचार्य वेदपाल जी 'सुनीथ'

संसार में बहुत थोड़े से मनुष्य ऐसे होंगे, जिनकी अन्तर आत्मा में अपने कल्याण के भाव न उठते हों। प्रायः सभी व्यक्ति कभी न कभी अवश्य सोचते हैं कि कल से अपनी इस बुराई को छोड़ दूंगा, अथवा कल से अमुक भद्रता को धारण करूंगा।
शराबी कभी कभी विचारता है कि मैं कितना पाप कर रहा हूँ। सब कुछ नष्ट कर रहा हूँ, स्त्री, बच्चे परेशान हैं, भूखे हैं, गांव मुहल्ले में कोई इज्जत नहीं, धर्म खो दिया, बस अब शराब नहीं पीऊँगा।
जुआरी जब जुए में हार कर आता है तो उसकी प्यारी पत्नी उसे कोसती है, उसके अपने बच्चे उसे घृणा से देखते हैं तो सोचता है, मैं कितना पापी हूँ उसकी अन्तरात्मा कह उठती है अब आगे इस पाप कर्म को नहीं करूंगा।
व्यभिचारी की गति भी ऐसी ही है। देखिये यह चोर जा रहा है, होथों में हथकडि़यां हैं। मुंह नीचे लटका रहा है। सड़क पर चलने वाला प्रत्येक व्यक्ति उसे घृणा से देख रहा है। अब चोर मन ही मन कह रहा है ओह भूल की मैंने, मेहनत की रोटी खाता, इज्जत से चलता। बस इस बार छूट जाऊँ, आगे यह पाप नहीं करूंगा।
यह कल कल तथा आगे आगे की बात प्रायः सब के साथ लगी है। कोई बुराई को छोड़ने के लिए कल का आश्रय लेता है तो कोई अच्छाई को अपनाने के लिए।
ये देखिये ये एक श्रेष्ठी हैं। इनका जीवन धार्मिक है, इनमें  शराब चोरी आदि का कोई व्यसन नहीं है, आयु साठ वर्ष के आसपास है, बच्चे व्यापार में लगे हुए हैं, धन की कोई कमी नहीं है, कहने को सब कुछ है। हमने लाला जी से पूछा-आप का जीवन बहुत अच्छा है भगवान ने सब कुछ आप को दिया है। हमारे प्रश्न को सुनकर लालाजी कुछ सोचकर बोले-आप ठीक कह रहे हैं, परन्तु धन दौलत, पुत्र पौत्र कब तक साथ रहेंगे, यह तो सब कुछ एक दिन छूट जाएगा। अब तो बस ईश्वर का ध्यान लगाना चाहिए। माया मोह को छोड़ना चाहिए। सोचता हूँ कल से नियमित ईश्वरोपासना आरम्भ कर दूँगा। 
विचार करने से ज्ञात हुआ कि सांसारिक लोगों की आशाओ का केन्द्र बिन्दु कल है। ईश्वर का भक्त ईश्वर की नहीं, कल की उपासना में लगा हुआ है। उत्तम स्वास्थ्य का उपासक युवक भी व्यायाम को छोड़ कल की उपासना में लगा हुआ है।
कल की उपासना के इस विचित्र दृश्य को जब महर्षि याज्ञवल्क्य ने अपने अन्तः चक्षुओं से देखा तो उनके मुख से अनायास निकला-
न श्वः उपासीत को हि मनुष्यस्य श्वो वेद।
ओ संसार के लोगों! कल की उपासना में मत लगो, क्या कोई जानता है, तेरा कल आएगा वा नहीं ? प्रभु ने तुझे पैदा करते ही बताया था कि हे मनुष्य, तू अपने इस धन दौलत को सदा साथ देने वाले मत समझना। पता नहीं कब हवा चले और तू पीपल के पत्तों की तरह टूट कर पाप पुण्य से एकत्रित इस भौतिक सम्पत्ति से वंचित हो जाए।
इसलिए यदि तू महान् बनना चाहता है, कल्याण को प्राप्त करना चाहता है तो कल की उपासना को छोड़कर, आज की उपासना कर। जो आज बुराई नहीं छोड़ सकता उसके कल का क्या भरोसा। भला जो आज भद्र नहीं कर सकता उसके कल की भी क्या आशा।
महापुरुषों की सफलता का रहस्य यही है कि वे जानते ही तत्काल दुरितों को छोड़ देते हैं और भद्र को धारण कर लेते हैं।
बस देवगण अद्य प्रिय हैं तो मनुष्य श्वः प्रिय हैं।

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

स्तुति विषय।।2।।

अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। 
होतारं रत्नधातमम्।।2।।

व्याख्यानः- हे वन्द्येश्वराग्ने ! आप ज्ञानस्वरूप हो, आपकी मैं स्तुति करता हूं।
सब मनुष्यों के प्रति परमात्मा का यह उपदेश है, हे मनुष्यों ! तुम लोग इस प्रकार से मेरी स्तुति, प्रार्थना और उपासनादि करो जैसे पिता वा गुरु अपने पुत्र वा शिष्य को शिक्षा करता है कि, तुम पिता वा गुरु के विषय में इस प्रकार से स्तुति आदि का वत्र्तमान करना वैसे सबके पिता और परम गुरु ईश्वर ने हमको कृपा से सब व्यवहार और विद्यादि पदार्थों का उपदेश किया है जिससे हमको व्यवहार ज्ञान और परमार्थ ज्ञान होने से अत्यन्त सुख हो। जैसे सबका आदिकारण ईश्वर है वैसे परम विद्या वेद का भी आदिकारण ईश्वर है।
हे सर्वहितोपकारक ! आप ‘‘पुरोहितम्’’ सब जगत् के हितसाधक हो, हे यज्ञदेव ! सब मनुष्यों के पूज्यतम और ज्ञान-यज्ञादि के लिये कमनीयतम को ‘ऋत्विजम्’ सब ऋतु वसन्त आदि के रचक, अर्थात् जिस समय जैसा सुख चाहिये उस सुख के सम्पादक आप ही हो ‘‘होतारम्’’ सब जगत् को समस्त योग और क्षेम के देनेवाले हो और प्रलय समय में कारण में सब जगत् का होम करनेवाले हो ‘‘रत्नधातमम्’’ रत्न अर्थात् रमणीय पृथिव्यादिकों के धारण रचन करनेवाले तथा अपने सेवकों के लिये रत्नों के धारण करनेवाले एक आप ही हो। हे सर्वशक्तिमन् परमात्मन् ! इसलिये मैं वारम्वार आपकी स्तुति करता हूं इसको आप स्वीकार कीजिये, जिससे हम लोग आपके कृपापात्र होके सदैव आनन्द में रहें।।2।।

महर्षि दयानंद जी सरस्वती महाराज 

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

पाप का घड़ा एक न एक दिन भरता अवश्य है

राम और श्याम दो मित्र थे। दोनों ने दूध बेचने का व्यापार प्रारम्भ किया। राम स्वभाव से ईमानदार, शान्तिप्रिय, सज्जन व्यवहार का था जबकि श्याम कुटिल, लालची एव क्रूर स्वभाव का था। राम ने सदा ईमानदारी से दूध बेचा और कभी मिलावट नहीं की। जबकि श्याम पानी मिलाकर दूध बेचता रहा। धीरे-धीरे श्याम धनी बनता गया और राम निर्धन का निर्धन बना रहा। धीरे-धीर राम के मन में एक विचार बार-बार घर करने लगा कि क्या व्यक्ति को अधर्म से ही सुख मिलता है ? राम के मन में यह विचार उठ ही रहा था कि एक साधु उनके गाँव में पधारे। राम ने उनके समीप जाकर कहा-महात्मा जी मनुष्य धर्म से फलता है अथवा अधर्म से। महात्मा जी मुस्कुराए एवं राम को अगले दिन इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए आने को कहा। राम जब अगले दिन उनके समीप पहुँचा तो उसने देखा कि महात्मा जी के यहाँ पर धरती में आठ फुट गहरा गढ़ा खुदा हुआ है। महात्मा जी ने राम को उस गढ़े में खडे़ होने को कहा। अब उस गढ़े में जल डाला जाने लगा। जब जल राम के पैरों तक पहुँच गया तो महात्मा जी ने पूछा कोई कष्ट। राम ने उत्तर दिया नहीं कोई कष्ट नहीं है। जब जल राम की कमर तक पहुँच गया तो महात्मा जी ने पुनः पूछा कोई कष्ट ? राम ने कहा नहीं। जब जल राम के सिर तक पहुँच गया तो महात्मा जी ने पूछा कोई कष्ट ? राम ने उत्तर दिया महात्मा जी बाहर निकालिए नहीं तो प्राणों पर बन आयेगी। महात्मा जी ने राम को बाहर निकाला और पूछा अपने प्रश्न का उत्तर समझे ? राम ने कहा नहीं समझा। महात्मा जी ने कहा-’’जब पानी आपके पैरों, कमर, गर्दन तक पहुँचा तब आपको कष्ट नहीं हुआ और जैसे ही सिर तक पहुँचा आपके प्राण निकलने लगे। इसी प्रकार से पापी व्यक्ति के पाप जब एक सीमा तक बढ़ते जाते हैं तब एक समय ऐसा आता है कि उसके फल से उसका बच निकलना संभव नहीं होता और वह निश्चित रूप से अपने पापों का फल भोगता है। मगर पापों का फल मिलना निश्चित है।’’ 
अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दशवर्षाणि तिष्ठति।
प्राप्त एकादशे वर्षे समूलं च विनश्यति।।

बुधवार, 24 सितंबर 2014

विश्व-शान्ति दिवस और हम

नन्द किशोर आर्य
गुरुकुल कुरुक्षेत्र
हरियाणा

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है, संस्कृत के इस सारस्वत कथन में मनुष्य ही नहीं अपितु सभी प्राणियों के प्रति बन्धुभाव प्रकट होता है। सृष्टि का कण-कण अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रतिक्षण कार्य में संलग्न है। ईश्वर की इस विराट संरचना में कुछ भी तो ऐसा नहीं है जो व्यर्थ हो। इन सब अद्भुत रचनाओं में विश्व की सभी आत्माओं को स्वतन्त्रता पूर्वक कार्य करने के लिए परमात्मा की ओर से प्राप्त अनुपम भेंट मानव के शरीर का मिलना है। मानव से भिन्न प्रत्येक प्राणी ईश्वर प्रदत्त स्वभाव के अनुकूल ही अपने-अपने कार्य में संलग्न हैं। इस सारी कायनात का बुद्धिपूर्वक यदि कोई सीधा-सीधा लाभ लेता है तो वह केवल और केवल मनुष्य ही है। विज्ञान के अधुनातन विकास से पूर्व तक मनुष्य अपने जीवन जीने के साधनों को प्राप्त करने में लगा रहा। आवश्यकताओं के अनुकूल होते गए आविष्कारों ने जहाँ मानव को सुख, समृद्धि एवं शान्ति प्रदान की वहीं बेतहाशा बढ़ती लालसा के कारण मानव ने अपने सहित पृथ्वी, आकाश, सागरों, नदियों, वनों एवं सम्पूर्ण प्रकृति मात्र को अशान्ति की ओर धकेल दिया है। स्वार्थ की पशुवृत्ति ने मानव को इतना निर्दयी बना डाला कि वह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने से उत्पन्न पीड़ा तक को अनुभूत नहीं कर पा रहा है।

प्रतिवर्ष विश्वभर में विश्व शान्ति दिवस अथवा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति दिवस 21 सितम्बर के दिन पूरी पृथ्वी पर अहिंसा को कायम रखने के लिए एवं शान्ति का सन्देश देने के लिये मनाया जाता है। यह दिवस सभी देशों और लोगों के बीच स्वतन्त्रता, शान्ति और प्रसन्नता का एक आदर्श माना जाता है। वर्ष 1982 से प्रारम्भ होकर 2001 तक सितम्बर मास के तीसरे मंगलवार को विश्व शान्ति दिवस के रूप में मनाया जाता रहा, लेकिन वर्ष 2002 से इसके लिए 21 सितम्बर का दिन निश्चित कर दिया गया, तब से यह दिवस इसी तिथि को मनाया जाता है।

प्रारम्भिक काल में व्यक्ति अपनी मूल आवश्यकताओं तक सीमित रहकर उपलब्ध संसाधनों से अपना काम चलाता रहा। समय बीतने के साथ ही मानव में संग्रह की प्रवृत्ति प्रबल होने लगी। संग्रह की गई वस्तुओं के संवर्धन एवं संरक्षण के साथ ही शान्ति की अथाह गहराई से उठकर उसने स्वयं ही अशान्ति का चोला ओढ़ना प्रारम्भ कर दिया। क्षणिक सुख की चाह में वस्तुओं का निरन्तर संग्रह करने से यह लबादा दिन-प्रतिदिन दृढ़ होता गया। सीमित आयु में असीमित पाने की इच्छा ही व्यक्ति को अशान्ति के गहरे गर्त में धकेल देती है। जो तेरा है वह तेरा ही है जो मेरा है वह भी तेरा है यह दैवीय भाव हैं, जो तेरा है वह तेरा है और जो मेरा है वह मेरा है यह मानवी भाव है, जो मेरा है वह मेरा ही है लेकिन जो तेरा है वह भी मेरा ही है यह आसुरी विचार मनुष्य के सुख-चैन को समाप्त कर घोर नरक की ओर ले जाने वाला है। जीओ और जीने दो की देव संस्कृति को छोड़ आसुरी कुसंस्कृति की ओर झुकना ही अशान्ति के प्रथम द्वार को खोलना है। अशान्ति व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, समाज से देश एवं देश से सम्पूर्ण वसुधा में प्रसृत होती गई। 

लगभग सभी देश इस समय जन-धन की अपार हानि से प्रतिदिन जूझ रहे हैं। इस वैश्विक हानि की समस्या का प्रमुख कारण मात्र आतंकवाद ही है। आतंकवाद विकृत, सड़ी-गली एवं उन्मादी मानसिकता से उत्पन्न मानवता के प्रति किया गया घृणित अपराध है। अकारण स्वयं ही किसी को भी अपराधी मानकर परमात्मा की इस सुन्दरतम रचना का विनाश करना कितना अधम व अक्षम्य अपराध है, इसकी कल्पना मात्र से ही शरीर के रोंगटे खडे़ हो जाते हैं। निरपराध एवं अबोध छोटे बालकों, प्राणों की भीख माँगती महिलाओं, असहाय व चलने में अक्षम वृद्धों व निःशस्त्र युवाओं पर घात लगाकर अथवा प्रत्यक्ष रूप से मौत के घाट उतार देना आतंकियों की पतित मानसिकता का परिचय देने के लिये पर्याप्त है। आह! इनकी नीचता की पराकाष्ठा तो तब देखने को मिलती है, जब वे कोमलमति लघुवय बालक-बालिकाओं के करुण-क्रन्दन को अनसुना कर, उनके हृदय व मस्तिष्क को चीरकर, अपना निवाला बनाकर, क्रूर पशुओं को भी लजा देते हैं। मानवता के इन घृणित अपराधियों की इस बिलबिलाहट के कारण सम्पूर्ण मानवजाति पर समाप्ति का खतरा मंड़रा रहा है।

दिलों में जिनके लगती है, वो आँखों से नहीं रोते।
जो अपनों के नहीं होते, किसी के भी नहीं होते।
समझते जो पराया दर्द, अपने दर्द से ज्यादा।
किसी के रास्ते में वो, कभी काँटे नहीं बोते।।

एक समुदाय दूसरे समुदाय को निगल जाना चाहता है, एक असभ्यता दूसरी सभ्यता को नष्ट करने पर उतारु है, एक जाति दूसरी जाति को समूल नष्ट कर देना चाहती है एक शक्तिशाली देश दूसरे दुर्बल राष्ट्र के संसाधनों को हड़प जाना चाहता है। समुदायों, सभ्यताओं जातियों एवं देशों को नष्ट कर देने वाली ये ताकतें मानवमात्र को शान्ति से जीने का अधिकार नहीं दे सकती ? नस्लभेद, अस्पृश्यता, जातिभेद, आर्थिक असमानता ऐसे विषबुझे तीर हैं जो मानवता को लम्बे समय से निरन्तर मर्माहत कर रहे हैं। इक्कीसवीं सदी के विकसित समाज में भी बहुत से लोग पाषाण युग के पाशविक काल में जीना पसन्द करते हैं। हम शान्ति लाने का प्रयास तो करें। अहिंसा परमो धर्म भारत का मूलमन्त्र रहा है। शान्तिप्रियता इस देश की अकूत सम्पदा सदा से रही है। यदि किसी क्रूर व आततायी शासक को शान्ति की राह में कभी रोड़ा भी समझा तो उसे ऐसे ही समाप्त नहीं कर दिया अपितु उसे सही राह पर आने के अवसर प्रदान किये गये। हमारे इतिहास में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने रावण को युद्ध से पूर्व शान्ति-सन्देश भेजा, योगिराज श्रीकृष्णचन्द्र महाभारत के युद्ध से पूर्व स्वयं शान्तिदूत बन कौरवों के पास गए। महात्मा चाणक्य ने घनानन्द से सीमाओं पर शान्ति रहे ऐसी ही प्रार्थना तो की थी। भयंकर परिणामों वाले हिंसा के मार्ग को कभी-कभी क्रूर व्यक्तियों को सबक सिखाने के लिए अपनाना पड़ता है। कभी-कभी हिंसा के गर्त से निकलकर सम्राट अशोक जैसे अहिंसक बन व्यक्तित्व महात्मा बुद्ध के अहिंसा के सदुपदेश को मानवमात्र तक पहुँचने का सफल प्रयास करते हैं।

परस्पर मैत्रीभाव शान्ति की जड़ों को गहराई तक ले जाता है। मित्रस्य चक्षुषा वयं सर्वाणि भूतानि समीक्षामहे अर्थात् हम सब एक दूसरे को मित्र की दृष्टि से देखें, यजुर्वेद का यह पावन मन्त्र शान्ति का पवित्र उद्घोष करता प्रतीत होता है। मनुर्भव जनया देव्यं जनम् हम सही मायनों में मनुष्य बन अपनी आने वाली पीढि़यों को भी मनुष्य बनने का उपदेश करें। आज भी असमानता का नर्तन समाज में देखने को मिल जाता है। समानता के साथ समरसता होने पर ही मानव, मानव बन सकता है लेकिन समरसता केवल समभाव से नहीं अपितु ममभाव से आती है, जब हम समता की बात करें तो वहाँ ममता को भी उच्चपद प्रदान करने की आवश्यकता रहती है। अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्। यह मेरा है यह तुम्हारा है यह तुच्छबुद्धि की बातें हैं, उदारचेता व्यक्ति पूरी वसुधा को एक परिवार मानकर व्यवहार करते हैं। आसुरी-भावों को मन-मन्दिर से बाहर निकाल फेंके। भौतिक उन्नति के साथ ही साथ आध्यात्मिक उन्नति की समाज में अत्यन्त आवश्यकता है। अक्षरज्ञान व तकनीकी ज्ञान के अतिरिक्त छात्रों को नैतिक व चारित्रिक ज्ञान भी करायें। आकाश की ऊँचाई को स्पर्श करने की अभिलाषा के साथ ही अपनी जमीनी हकीकत से भी वाकिफ रहें। जीवन में ऊँचा चाहे कितना भी उठें लेकिन नीचे पायदान पर खडे़ लोगों के हृदय के स्पन्दन की अनुभूति को महसूस अवश्य करते रहें तभी मानव जन्म की सार्थकता सिद्ध होगी।

विश्व शान्ति दिवस के उपलक्ष्य में मैं इतना ही कहना चाहता हूँ:-

शपथ लेकर हम निरन्तर शान्तिपथ पर ही चलें।
सामने बाधा हो कितनी, हिंसक विचारों को मलें।
क्रूरता कितनी हो फिर भी शान्तिभाव से बढे़ं पलें।
सुखी, नीरोगी सब हों नित अभाव किसी का कभी न खले।