सोमवार, 18 फ़रवरी 2013

१. मैं अग्नि की स्तुति करता हूँ


स्वामी देवव्रत जी
प्रधान संचालक
सार्वदेशिक आर्यवीर दल
 
ओ३म् अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विम्।
होतारं रत्नधातमम्।।
 ऋ. १। १। १।।

मैं (पुरोहितम्) सृष्टि उत्पत्ति से पूर्व कारण रूप प्रकृति को धारण और (ऋत्विजम्) सृष्टि उत्पत्ति काल में परमाणुओं का संयोग कर सृष्टि की रचना करने (यज्ञस्य होतारम्) सृष्टि की उत्पत्ति के पश्चात् (रत्नधातमम्) विविध रत्नों से युक्त पृथिवी एवं अन्य लोकों के धारण करने वाले (देवम्) सब पदार्थों के प्रदाता, प्रकाशक (अग्निम्) सबके नेता, ज्ञानस्वरूप परमेश्वर की (ईडे) स्तुति करता हूँ।

छेदन, भेदन, धारण, आकर्षण गुण वाले (ऋत्विजम्) विविध यन्त्रों को गति देने वाले (देवम्) प्रकाशयुक्त (रत्नधातमम्) रमणीय पदार्थों को प्राप्त कराने वाले (अग्निम्) भौतिक अग्नि के (ईडे) गुणों को जान उसका सदुपयोग करता हूँ।

इस मन्त्र में अग्नि आध्यात्मि और भौतिक दोनों ही अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। इसी भाँति राजा, सभाध्यक्ष, विद्वान् को भी अग्नि कहते हैं।

यहा अग्नि शब्द द्वारा ईश्वर का ग्रहण किया है।

पुरोहितम्-सृष्टि की उत्पत्ति से पहले भी वह परमेश्वर सबका अग्रणी था और उसमें सृष्टि की रचना करने का ज्ञान तथा सामर्थ्य भी था।

यज्ञस्य होतारम्-परमेश्वर स्वयं यज्ञ स्वरूप है जिसने अपने ज्ञान एवं सामर्थ्य से एक-एक परमाणु को मिलाकर इस संसार की अद्भुत रचना की है।

ऋत्विज् से अभिप्राय यह है कि ऋतु अर्थात् जब सृष्टि रचने का समय आता है तो वह प्रभु अपनी ईक्षण क्रिया से सृष्टि की उत्पत्ति करता है। जैसे एक के पश्चात् दूसरी ऋतु बदल कर आती रहती है वैसे ही अनादि काल से सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय का क्रम चल रहा है।

भोगापवर्गार्थं दृश्यम् (योगदर्शन २.१८) भोग और अपवर्ग मोक्ष के लिये सृष्टि रचना हुई है और इसमें रत्नधातमम् विविध रत्न, हीरे, मोती, स्वर्णादि बहुमूल्य पदार्थों का निर्माण किया है। हमारी सारी आवश्यकताओं की आपूर्ति इस भूमि माता से ही होती है।

इन दिव्य गुणों के प्रकाशक, मार्गदर्शक, ज्ञानस्वरूप अग्नि परमेश्वर की मैं स्तुति करता हूँ।

इस भौतिक अग्नि में भी दिव्य गुणों को उसी परमेश्वर ने भरा है जिन्हें जानकर हम अपना जीवन सुखी बना सकते हैं।

साभार-वेद-स्वाध्याय 
लेखक - स्वामी देवव्रत सरस्वती जी 

शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

आचरण का सहारा

आचार्य सत्यजित् जी

आध्यात्मिक चिन्तन के क्षण......

प्रभु का सहारा सदा हमारे साथ है। परिजनों, इष्ट-मित्रों का सहारा भी हमें प्राप्त होता रहता है। सहारा देने वालों से सदा सबकोे सहारा नहीं मिल पाता है। परिजन, इष्ट-मित्र भी बेसहारा छोड़ जाते हैं। तब केवल प्रभु का सहारा दिखाई पड़ता है। तब प्रभु के सहारे को स्मरण कर धैर्य रखा जाता है। इतना होने पर भी मन में संदेह होता रहता है, क्योंकि जितना सहारा व सहयोग हम चाहते हैं वह हमें नहीं मिल पाता। परिजन, इष्ट-मित्र तो अल्पज्ञ अल्पशक्तिमन् आत्माएं हैं, प्रायः स्वार्थ पूरा न होते देख बेसहारा छोड़कर चले जाते हैं। किन्तु प्रभु तो सर्वज्ञ हैं, सर्वशक्तिमान् हैं, उनके रहते भी सहारे व सहयोग का न मिल पाना संशय उत्पन्न कर देता है।

प्रभु का सहारा हो या परिजनों का, यह प्रायः तभी पर्याप्त मिलता है जब हमारा आचरण-व्यवहार अच्छा हो। परिजनों-इष्ट मित्रों का सहारा तब अच्छा मिलता है, जब हम उनके लिए उपयोगी हों, हम उनका उपकार करते हों, हम उनके सहयोगी बनते हो, या हमारा आचरण-व्यवहार बहुत अच्छा हो। इनके अभाव में हम धीरे-धीरे बेसहारा होते जाते है। अपवाद रूप में कभी-कभी अच्छे आचरण-व्यवहार वालों को भी अन्यों का सहारा नहीं मिल पाता है। दुष्टों-अधार्मिकों का स्वार्थ अच्छे आचरण वाले से पूरा नहीं होता, अच्छे आचरण वाला उन्हें सहयोग नहीं करता, अतः वे भी अच्छे आचरण वाले का सहयोग नहीं करते। लौकिक सहारे परस्पर सहयोग पर निर्भर करते हैं।

प्रभु का सहारा परस्पर सहयोग के बिना निःस्वार्थ भाव से चलता है। प्रभु को हमसे किसी सहारे की आवश्यकता नहीं है। वे तो सर्वशक्तिमान्, सर्वसमर्थ, पूर्णकाम हैं। पर हमें तो उनके सहारे की आवश्यकता है। उसके बिना हम पूर्णतः असमर्थ-पंगु हैं। प्रभु का सहारा भी निरपेक्ष नहीं है। प्रभु सब को समान सहारा नहीं देते। हम कैसे भी अच्छे-बुरे हों, हम कैसे भी अच्छे-बुरे कर्म करें और प्रभु सदा पूरा सहारा देते रहें, ऐसा नहीं होता। प्रभु भी हमारे से अपेक्षा रखते हैं। प्रभु सबको सहारा दे सकते हैं, देने को उद्यत हैं, देते रहते हैं, किन्तु वे न्यायकारी भी हैं, अतः यथायोग्य सहारा देते हैं। प्रभु का सहारा हमारे आचरण पर निर्भर करता है। प्रभु अच्छों को सदैव अच्छा सहारा देते हैं। भले ही कभी संसार का सहारा अच्छों को न मिले, पर प्रभु का सहारा अच्छों को सदा मिलता रहता है।

संसार का सहारा अच्छे व बुरे दोनों प्रकार के मनुष्यों से छूट सकता है। ऐसे में अच्छे-बुरे दोनों प्रकार के मनुष्य प्रभु के सहारे को पकड़ते हैं, मन में उसके सहारे की कामना करते हैं, उसके सहारे की आशा रखते हैं। किन्तु ऐसे में भी प्रभु का सहारा सबको नहीं मिलता। प्रभु अच्छों को ही सहारा देते हैं। बुरे तो प्रभु के यहां भी बेसहारा होते हैं। अच्छों को प्रभु का सहारा मिलने का विश्वास रहता है, अतः संसार का सहारा न मिलने पर भी वे शान्त-संतुष्ट रह लेते है। बुरों को प्रभु का सहारा नहीं मिलता, उन्हें भी मन में सन्देह रहता है, अतः वे येन-केन प्रकारेण संसार का ही सहारा पाने में लग जाते हैं। वे जैसे-तैसे सांसारिक सहारा पा भी लेते हैं, पर इस प्रक्रिया में बुरा आचरण करते रहने से प्रभु के सहारे से और अधिक दूर होते जाते हैं।

प्रभु का सहारा हो या सांसारिक सहारा, सर्वत्र मूल में हमारा अपना आचरण आधार बनता है। हमारा आचरण अच्छा हो तो सांसारिक सहारा भी पर्याप्त मिल ही जाता है, प्रभु का सहारा तो बरस-बरस पड़ता है। जब हम आचरण का सहारा लेते हैं, तो सारे सहारे सहज मिलते रहते हैं। आचरण का सहारा छोड़ जब हम अन्यों का सहारा पाना चाहते हैं, तो विफल होते रहते हैं। आचरण हमें सीधा सहारा नहीं देता, सीधा सहारा तो संसार या प्रभु देते हैं, किन्तु आचरण ही वह मूल है जो अन्यों से सहारा दिलवाता है।

प्रभु की कृपा है कि उसने हमें आचरण के लिए आवश्यक सभी साधन दे रखे हैं। शरीर, इन्द्रियां, मन, बुद्धि, ज्ञान, प्रकृति आदि सब हमारे आचरण के सहयोगी रूप में बनाये हैं। मात्र आचरण का सहारा पकड़ने से सारे सहारे हमारा स्वागत करने लगते हैं। हमें ससम्मान सहारा मिलता है, श्रद्धा व प्रेम से सहारा मिलता है। आचरण का सहारा सब सहारों की कुंजी है, सब सहारों का मूल है। यह आचरण स्वाश्रित है, हम स्वतन्त्रता से अपना आचरण तो अच्छा रख ही सकते हैं।



शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2013

ब्रह्मवृत्ति

स्वामी विद्यानंद जी 'विदेह'

युंजते मन उत युंजते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः। 
वि होत्रा दधे वयुनाविदेक इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः।।

{यजुर्वेद ५.१४, ¬११.४, ३७.२} ऋग्वेद ५.८१.१

यह मानव-शरीर आत्मा की परिस्तुति वा महिमा है। आत्मा शरीर का सविता देव है। ‘सविता’ आ अर्थ है स्रष्टा और संचालक। आत्मा के मिष से ही शरीर की रचना होती है, और आत्मा ही शरीर का संचालन करता है। मनुष्यदेह कैसी कुशल, पूर्ण और अद्भुत मशीन है, और आत्मा कैसी कुशलता से इसके कण-कण, अणु-अणु और अंग-प्रत्यंग का संचालन करता है। शरीर दिखाई देता है पर आत्मा दिखाई नहीं देता। जब किसी महात्मा की महिमा श्रवण करके वा उसकी किसी कृति से परिचित होकर हम उसके दर्शन करने जाते हैं तो हम उसके दर्शन करके उसको प्रणाम करते हैं, उसका स्तवन करते हैं और अपने को कृतकृत्य मानते हैं। दर्शन केवल शरीर का होता है, आत्मा का नहीं। जो दृष्टि का विषय है, दर्शन उसी का होता है। दृष्टि का विषय न होने से, आत्मा का नेत्रों से दर्शन नहीं हो सकता। फिर भी, यह सत्य है कि हम महात्मा के दर्शन करते हैं। महात्मा में महा-आत्मता है वह आत्मा की ही है पर आत्मा दिखाई नहीं देता। क्योंकि महात्मा का शरीर उसके आत्मा से व्याप्त है अतः उस महात्मा के शरीर के दर्शन में उसके आत्मा का दर्शन भी सन्निहित है। नेत्रों से हम महात्मा के शरीर के दर्शन करके, आत्मना उसके आत्मा से आत्मीयता करते हैं।

यह सम्पूर्ण समष्टि भी उस विश्वात्मा सविता देव का विराट् शरीर है, द्यौ जिसका मूर्धा है, नद्वात्र जिसके केश हैं, सूर्य-चन्द्र जिसके नेत्र हैं, अन्तरिक्ष जिसका उदर है, भूमि जिसका पाद है, और वात जिसका प्राणापान है अनादि, अनन्त और असीम विश्वात्मा की यह समष्टिदेह भी प्रवाह से अनादि, अनन्त और असीम है। नेत्रों से उस अवश्वात्मा के विराट् स्वरूप का दर्शन कीजिए। विश्वात्मा से विराट् की और विराट् से विश्वात्मा की पृथक्ता हो ही नहीं सकती। अतः मानव-शरीरवत् विराट् के दर्शन में विश्वात्मा का दर्शन भी सन्निहित है।
यह सूत्रधार विश्वात्मा इस समष्टि सृष्टि में रमा हुआ, इसकी प्रत्येक चेष्टा को चेष्टित करता हुआ, नाना-लोकरूपी इन्द्रियों का संचालन कर रहा है। प्रत्येक चेष्टा और गति में, प्रत्येक दृश्य और दर्शन में, प्रत्येक स्वर और गान में, प्रत्येक गीति और प्रगान में, प्रत्येक लय और तान में, प्रत्येक रस और सुगन्ध मंे सर्वत्र ब्रह्म की महिमा का अवलोकन करते हुए, ब्रह्मदृष्टि और ब्रह्मानुभूति का अभ्यास कीजिए। इस अभ्यास के पकने पर आपको ब्रह्मवृत्ति की सिद्धि प्राप्त हो जाएगी।

(विप्राः) मेधावी जन, योगी जन (मनः) मन को (युंजते) युक्त करते हैं (उत) और (धियः) धारणाओं को (युजते) युक्त करते हैं। 

वह (वयुन्-वित्) सब चेष्टाओं-गतियों का जानने वाला (एकः इत्) एक ही, अकेला ही (होत्रा) होत्रों, यज्ञों, लोक-लोकान्तरों को (वि दधे) धारण कर रहा है।

उस (बृहतः) महान् (विपश्चितः) ज्ञानी (विप्रस्य) मेधावी, बुद्ध (सवितुः देवस्य) सविता देव की (परि-स्तुतिः) अभिस्तुति, महिमा (मही) महती है।



माधुर्य

स्वामी विद्यानंद जी 'विदेह'

मधुमन्म निक्रमणं मधुमन्मे परायणम्।
वाचा वदामि मधुमद् भूयासं मधुसंदृशः।।

अथर्ववेद १.३४.३

क्रोध, कटुता, रूक्षता, उद्विग्नता स्वभाव-सम्बन्धी भयंकर दोष हैं। इनसे नितराम् चित्त में विक्षोभ, मन में अशान्ति, बुद्धि में असन्तुलन और इन्द्रियों में चंचलता का प्रस्फुटन होतर रहता है जिससे मनुष्य का समाहितचित्त, शान्तमन, समबुद्धि और स्थिरेन्द्रिय होना कठिन ही नहीं, सर्वथा असम्भव होता है। इन स्वभावदोषों के निवारण के लिए मधुरता का अभ्यास कीजिए। मधुरता के अभ्यास के लिए उपर्युक्त मन्त्र को शब्दार्थसहित कण्ठस्थ करके, उसका सदा सर्वदा गान कीजिए। (मे) मेरा (नि-क्रमणम्) निकट आना, मिलना (मधुमत्) मधुयुक्त, मधुर हो। (मे) मेरा (परा-अयनम्) प्रत्यागमन, बिछुड़ना, वियुक्त होना (मधु-मत्) मधुर हो। मैं (वाचा) वाणी से (मधुमत्) मधुर (वदामि) बोलूं। मैं (मधु-सम्-दृशः) मधु-सदृश, मधु सं-दृष्टि (भूयासम्) हो जाऊं।
जो जिस पदार्थ का सार होता है उसमें उस पदार्थ के गुण होते हैं। मधु नाम शहद का है। मधु पुष्पों का सार होता है। मधु में पुष्पों की स्निग्धता, मधुरता, सुगन्धि, सोम्यता, सुन्दरता, प्रसन्नता सन्निहित है। अतः मधुसेवी बनिए। मधु के समान सारग्राही, स्निग्ध, मधुर, सुगन्धित, सोम्य बनिए। मधुरता को अपनी प्रकृति बना लीजिए। सर्वथा मधुर स्वभाव हो जाइए। अपना ऐसा शील बनाइए, कि क्रुद्ध और अशान्त मनुष्य अथवा प्राणी आपसे मिलकर सहसा मधुर और शान्त हो जाए। जब कोई व्यक्ति आपसे वियुक्त {विदा} हो तो वह माधुर्य और स्नेह के साथ वियुक्त हो। आपका मिलना और बिछुड़ना माधुर्योपेत तभी होगा जब आपकी वाणी मधुर होगी। वाणी में माधुर्य तभी होगा जब आप मधुहृदय होंगे, साक्षात् माधुर्य हो जाएंगे, अन्दर-बाहर से साक्षात् मधु बन जाएंगे, और सब आपकी दृष्टि मधुदृष्टि बन जाएगी।

मधुरस्वभाव, मधुहृदय, मधुजिह्व व्यक्ति सदा शीतल, शान्त, सुखी, प्रसन्न, आनन्दित, प्रीतिमान्, सर्वप्रिय, समाहित, सन्तुलित, संयत, निश्चल और सन्तुष्ट रहता हुआ प्रत्येक क्षेत्र में विजयसाफल्य प्राप्त करता है। मधुर, शान्त आत्मा विकट से विकट परिस्थितियों को मुस्कराहट के साथ परास्त करता हुआ, जटिल से जटिल समस्याओं को सहजतया सुलझा लेता है।

मधुरता की भावना से सदा माधुर्योपेत रहिए। विचारों में मधुरता हो, दृष्टि में मधुरता हो, वाणी में मधुरता हो, हृदय में मधुरता हो, मन में मधुरता हो, चित्त में मधुरता हो। आप मधुर हो जाएंगे तो संसार में आपको सर्वत्र माधुर्य ही माधुर्य अनुभव होगा। माधुर्य से ही ब्रह्ममाधुर्य की अनुभूति होगी।



गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

निःस्पृहता

स्वामी विद्यानंद जी 'विदेह'
प्रियं मा कृणु देवेषु प्रियं राजसु मा कृणु।
प्रियं सर्वस्य पश्यत उत शूद्र उतार्ये।।

अथर्ववेद १९.६२.१

‘स्पृहा’ का अर्थ है इच्छा, चाहना, कामना। मनुष्य की स्पृहा का क्षेत्र जितना संकुचित होता है, मनुष्य उतना ही बद्ध और चिन्तित होता है। स्पृहा की परिधि जितनी विशाल और व्यापक होती जाती है, मनुष्य उतना ही निर्बाध और चिन्ता रहित होता जाता है। रुके हुए जल में दुर्गन्धि आती है; प्रवाहित जल दुर्गन्धिरहित होता है। पोखर में रुका हुआ जल ही सड़ सूख नहीं जाता अपि तु सागर में रुका हुआ जल भी क्षारयुक्त, दुर्गन्धित और अपेय होता है। परन्तु पोखर और सागर का जल वाष्प् बनकर आकाश में व्याप जाता है और मेघ बनकर सर्वत्र बरसता है तो वह रोगनाशक, स्वास्थ्यप्रद और अमृत बन जाता है। जिन कूपों में प्रवाहित स्रोतों का जल आता रहता है उनका जल जीवनप्रद होता है। जिन कूपों में वर्षा का जल रुक जाता है उनका जल उतना अच्छा नहीं होता। गुहा, गृह, ग्राम और नगर में रुका हुआ पवन भी दुर्गन्धित और रोगकारक होता है।

ससीम स्पृहा वह परिधि है जो मनुष्य को चिन्तारूपी दुर्गन्धि से दुर्गन्धित, और मोहरूपी क्षार से क्षारित बना देती है। यदि दुर्गन्धि और क्षार से रहित रहना है तो अपनी स्पृहा को व्यापक बनाइए। व्यापक स्पृहा का नाम ही निःस्पृहता है। स्पृहा को परिधिरहित कर दीजिए, आप निःस्पृह हो जाएंगे। अपनी स्पृहा को विश्वव्यापी बनाइए। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र- सबकी, मनुष्यमात्र की मंगलकामना और हितसाधना कीजिए और मनुष्यमात्र के प्रिय बनिए। प्राणिमात्र के हितचिन्तक और सेवाकारी बनकर, प्राणिमात्र के परम प्यारे बनिए। आप पर जिसकी भी दृष्टि पडे़ वही आपसे प्रेम करे। जो सबका है वह निःस्पृह है। जो निःस्पृह है वह निश्चिन्त है। जो निश्चिन्त है वह स्थिर और शान्त है। जो स्थिर और शान्त है वह धीर है।

(मा) मुझे (देवेषु) ब्राह्मणों में (प्रियम्) प्यारा (कृणु) कर। (मा) मुझे (राजसु) क्षत्रियों में, (उत) तथा (शूद्रे) शूद्र वर्ग में, (उत) तथा (अर्ये) वैश्य वर्ग में (प्रियम) प्यारा (कृणु) बना। मुझे (सर्वस्य पश्यतः) सब देखने वाले का (प्रियम्) प्रिय बना।



निर्लेपता

स्वामी विद्यानंद जी 'विदेह'

कुर्वन्नेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समा।
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे।।

यजुर्वेद ४॰.२

कर्म दो प्रकार से किए जाते हैं, १) इच्छया २) स्वभावतया। जहां इच्छा है वहां लेप है। इच्छापूर्वक किए गए कर्म में फलाकांक्षा अन्तर्निहित होती है। जहां फलाकांक्षा है वहां लेपता है। फलाकांक्षा जितनी तीव्र होगी, कर्मलेप भी उतना ही दीर्घसूत्री होगा। स्वभावज कर्म में न इच्छा होती है, न फलाकांक्षा, न कर्मलेपता। इच्छा से किए कर्म में वह महत्त्व भी नहीं होता जो महत्त्व स्वभाव से किए कर्म में होती है।

शरीर में सबसे अधिक महत्त्व का कार्य प्राण का संचालन है जो स्वभावतः ही होता रहता है। यदि कहीं प्राणसंचालन का कार्य इच्छा पर आधारित होता तो जीवन रह ही न सकता। प्राण के अतिरिक्त अन्य समस्त इन्द्रियों के व्यापार का आधार इच्छा है। प्रत्येक इन्द्रिय इच्छा से प्रेरित होकर कार्य करती है। प्राण स्वभावतः चलता है। प्रत्येक इन्द्रिय थकती है और विश्राम करती है। प्राण अनथकतया निरन्तर कर्म करता है और विश्राम नहीं लेता। प्राण विश्राम करने लगे तो जीवन ही समाप्त हो जाए। प्रत्येक इन्द्रिय का एक विषय है, और प्रत्येक इन्द्रिय अपने-अपने विषय में लिप्त है। प्राण का कोई विषय नहीं। प्राण निर्विषय है। प्राण किसी विषय की ओर अनुधावन नहीं करता। प्राण किसी विषय में लिप्त नहीं। प्राण केवल शुभ ही करता है और कर्तव्य के लिए ही कर्म करता है। प्राण निर्लेप है।

कर्म सृष्टि का धर्म है। कर्म का त्याग असम्भव है। गतिशील संसार में गतिविहीन होना सम्भव ही नहीं। गतिपूर्ण संसार में निश्चेष्टता का क्या काम। कर्म तो करना ही होगा। प्रथम, इच्छापूर्वक कर्मशोध कीजिए। तत्परता के साथ अशुभ कर्मों  के त्याग तथा शुभ कर्मों के सम्पादन का अभ्यास कीजिए। ऐसा करते करते आपसे अशुभ कर्मों का सर्वथा त्याग हो जाएगा, और आपसे शुभ ही कर्म हुआ करेंगे। शुभ ही शुभ कर्म करते करते, आपका शुभ ही कर्म करने का अभ्यास वा स्वभाव हो जाएगा। तब आप केवल कर्तव्य के लिए कर्म करेंगे और स्वभावतया ही शुभ कर्म करने लगेंगे। कर्तव्य के लिए कर्म कीजिए; कर्तव्य का स्वभावतया पालन कीजिए। कर्तव्य के लिए शुभ कार्य कीजिए; शुभ कर्म करने का स्वभाव बना लीजिए। स्वभाव से कर्तव्य और शुभ सम्पादन करने का अभ्यास सिद्ध होते ही आप निर्लेप हो जाएंगे।

अनासक्ति और निर्लेपता में भेद है। ‘अनासक्ति’ का अर्थ है भोगों में त्यागभाव। ‘निर्लेपता’ का अर्थ है कर्मों में त्यागभाव। त्यागभाव से भोगना अनासक्ति है, और त्यागभाव से, स्वभाव से कर्तव्य कर्म करना निर्लेपता है। अनासक्ति और निर्लेपता की सिद्धि होने पर समस्त ग्रन्थियां छिन्न-भिन्न हो जाएंगी, समस्त आवरण विलीन हो जाएंगे, और उस अजस्र, अखण्ड, अक्षय आत्मज्योत्सना का उदय होगा जिसके आलोक में सब कुछ स्पष्ट आलोकित होने लगेगा।

(इह) यहां (कर्माणि) कर्तव्य कर्मों को (कुर्वन् एव) करता हुआ ही (शतम् समाः) सौ वर्ष (जिजीविषेत्) जीने की इच्छा करे। (एवम्) इस प्रकार (त्वयि नरे) तुझ नर में (कर्म न लिप्यते) कर्म नहीं लिपता। निर्लेपता का (इतः अन्य-था) इससे भिन्न प्रकार उपाय (न अस्ति) नहीं है।


बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

अनासक्ति

स्वामी विद्यानंद जी 'विदेह'

ईशा वास्यमिदं सर्वं यत् किं च जगत्यां जगत्।
तेन त्यक्तेन भुंजीथा मा गृधः कस्य स्विद् धनम्।।

यजुर्वेद ४॰.१

(इदम् सर्वम्) यह सब विश्व इसके (ईशा वास्यम्) स्वामी से वास्य-व्याप्त है। यह विश्व स्वामीविहीन {लावारिस} नहीं है। इसका एक ईश {स्वामी} है और वह इस सम्पूर्ण विश्व में सर्वत्र समाया हुआ है। यह अखिल विश्व उसी एक सर्वव्यापक स्वामी का है। जब यह सारा जगत् उसका है तो फिर इस (जगत्याम्) जगती में (यत् किम् च) जो कुछ भी (जगत्) जगत् है, चर, अचर, जो कुछ है यह सब भी उसी का है। जगती का स्वामी, वह जगतीश इस सम्पूर्ण जगत् का अन्दर, बाहर, सर्वत्र अधिष्ठातृत्व कर रहा है।

यहां जो कुछ है वह सब उस जगतीश का ही है, तेरा कुछ नहीं। (तेन) तेन कारणेन, अतः (त्यक्तेन) त्याग के साथ, त्यागभाव से (भुंजीथाः) भोग। ‘मा भुंजीथाः’, मत भोग, वेद ऐसा नहीं कहता है। वेद ऐसी अप्राकृत बात कह ही नहीं सकता। जीवन भोगाश्रित है। भोग तो शरीर का धर्म है, प्रकृति का नियम है। भोगों का त्याग असम्भव है। इसीलिए वेद कहता है। (भुजीथाः) भोग, परन्तु (त्यक्तेन) त्यागभाव से भोग क्योंकि अ-निज को त्यागभाव से ही भोगना चाहिए।

क्या कोई भी प्राणी अथवा पदार्थ ऐसा है जो सदा से तेरे साथ हो और सदा तेरे साथ रहेगा ? जीवनपथ पर चलते हुए तुझे जो कुछ प्राप्त होता है वह जीते जी वा देहावसान पर त्यागना ही पडे़गा। अतः त्यागभाव से ही भोग। पराई वस्तु को जिस प्रकार भोगना चाहिए उसी प्रकार भोग। त्यागभाव से भोगने का नाम ही अनासक्ति है, विदेहता है। जो जीते जी अनासक्त है वह जीवन के उस पार पहुंचकर भी मुक्त रहता है। जो सदेह रहते हुए विदेह है वह देह त्यागने पर भी मोक्ष को प्राप्त होता है। जो इधर आसक्त है वह उधर भी बद्ध है। जो इधर मुक्त है वह उधर भी मुक्त है।

(मा गृधः) धनलोलुपता भी मत कर। (स्वित्) भला, सोच तो सही, (धनम्) जगत् का यह सब वैभव (कस्य) किसका है ? यह जगत् जिसका है, इस जगत् का सारा वैभव भी उसी का है। अतः धन की लोलुपता भी त्याग दे। धन वैभव का उपयोग भी त्यागभाव से ही कर।

बात सरल और स्पष्ट है जो तेरा नहीं है उसे अपना मत समझ। बस, इतनी सी बात है, जिसे जानने, मानने और समझने पर तू सर्वथा अनासक्त और जीवन्मुक्त विदेह हो जाएगा।