बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

पवित्रता-भाग दो

स्वामी विद्यानंद जी 'विदेह'
पवित्रता का महत्त्व प्रत्यक्ष है। शुद्धता की महिमा अकथनीय है। पवित्रता और शुद्धता का बड़ा माहात्म्य है। शुद्धता में सौन्दर्य है, रोचकता है, सुरुचि है। पवित्रता में अद्भुत आकर्षण  है। शुद्धता मनमोहिनी है। पवित्रता परम मोहिका है। शुद्धता परम श्रद्धास्पद है। शुद्धता में स्फुरण है, पवित्रता में प्रस्फुरण है। शुद्धता में, पवित्रता में चरम माधुर्य है और परम प्रियता है। शुद्ध गेह, शुद्ध देह, शुद्ध नगर, शुद्ध ग्राम, शुद्ध वस्त्र, शुद्ध आभूषण, सब बडे़ प्रिय और दर्शनीय प्रतीत होते हैं। सब, जो शुद्ध है, मनोरम है।

शुद्धता में ही रूपख्याति है। शुद्ध जल में, पवित्र दर्पण में, निर्मल घृत में ही स्व, पर रूप की प्रतीति होती है। पवित्र अन्तःकरण में ही आत्मसाक्षात्कार होता है। पवित्र अन्तःकरण में ही ब्रह्मानुभूति होती है।

पवित्रता ही धर्म है। पवित्रता ही मर्म है। विचारों की पवित्रता का ही नाम अहिंसा है। वाणी की पवित्रता का ही नाम सत्य है। भावनाओं की पवित्रता का ही नाम अस्तेय है। जननेन्द्रिय की पवित्रता का ही नाम ब्रह्मचर्य है। परिग्रह की पवित्रता का ही नाम अपरिग्रह है। देह की पवित्रता का ही नाम शौच है। वृत्तियों की पवित्रता को ही तप कहते हैं। अध्ययन की पवित्रता ही स्वाध्याय है। सत्त्व की पवित्रता ही ईश्वर-प्रणिधान है। पवित्रता ही यम है। पवित्रता ही नियम है। स्थिति {बैठने} की पवित्रता ही आसन है। प्राण की पवित्रता ही प्राणायाम है। मन की पवित्रता ही प्रत्याहार है। चिन्तन की पवित्रता ही धारणा है। मनन की पवित्रता ही ध्यान है। अन्तःकरण की पवित्रता ही समाधि है। पवित्रता ही अष्टांग योग है। चक्रों की पवित्रता ही का चक्रजागरण है।

पवित्रता में ही सर्वसम्पादन है। पवित्रता में ही सब ऋद्धियां और सिद्धियां निहित हैं। अतः तीव्रता के साथ, पूर्ण तत्परता के साथ पवित्रता की सतत साधना करते रहिए। शिर, भाल, भौं, नेत्र, कर्ण, नासिका, मुख, रसना, होठ, हनू, ग्रीवा, हस्त, स्कन्ध, वक्ष, पृष्ठ, जाठर, नितम्ब, मूल-मलेन्द्रिय, जंघा, पाद, सबको परम पवित्र बनाइए और सदा पवित्र रखिए। मेधा, बुद्धि, हृदय, मन और चित्त को परम पवित्र कीजिए और सदा पवित्र रखिए। पवित्रता के सम्पादन से योगसिद्धि सहजतया उपलब्ध हो जाती है। पूर्ण पवित्रता के बिना योग-सिद्धि असम्भव है। पवित्रता ही प्रजा है। पवित्रता ही योग है।

देव जनों, दिव्य जनों की संगति से जीवन की पवित्रता सम्पादन कीजिए। मननशीलों की संगति से बुद्धि और ध्यान की पवित्रता प्राप्त कीजिए। सब पंच भूतों की संगति से प्रकृति- विहार द्वारा पवित्रता लाभ कीजिए। पवमान {पवित्र भगवान्} की संगति से पवित्रता संचारित कीजिए। अन्दर बाहर से उभयतः, सर्वथा शुद्ध, पवित्र हो जाइए।

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

पवित्रता भाग-एक

स्वामी विद्यानंद जी विदेह 

पुनन्तु मा देवजनाः पुनन्तु मनवो धियाः।
पुनन्तु विश्वा भूतानि पवमानः पुनातु मा।। 

अथर्ववेद ६.१९.१

एक कटोरे में पवित्र जल भरकर रख दीजिए। उस कटोरे में सूर्य के दर्शन हो सकते हैं, उसमें चन्द्रमा के दर्शन कर सकते हैं, उसमें अपने रूप का अवलोकन किया जा सकता है। उस कटोरे में थोड़ी सी मिट्टी घोल दीजिए। अब न सूर्य के दर्शन हो सकते हैं, न चन्द्र के, न अपने रूप के। एक शुद्ध दर्पण ले लीजिए। उसमें स्व, पर का साक्षात्कार हो सकता है। दर्पण पर थोड़ी सी मिट्टी थोप दीजिए। अब कुछ भी प्रतिबिम्बित नहीं होगा।

प्रार्थना कीजिए, प्रयत्न कीजिए, कामना कीजिए कि (देवजनाः) दिव्य जन (मा) मुझे (पुनन्तु) पवित्र करें। (मनवः) मननशील जन मुझे (पुनन्तु) पवित्र करें। किस प्रकार ? (धिया) धारणा द्वारा, बुद्धि द्वारा, सुमति द्वारा। (विश्वा) सब (भूतानि) भूत, प्राणी मुझे (पुनन्तु) पवित्र करें (पवमानः) पवित्र प्रभु (मा) मुझे (पुनातु) पवित्र करे।

बुद्धि की निर्मलता से कर्मों की पवित्रता स्वतः सिद्ध हो जाती है। विचार और कर्मों की पवित्रता से भावनाएं शुद्ध होती हैं। भावनाओं की शुद्धि से हृदय, मन, चित्त तथा सत्त्व की शुद्धि होती है। इस प्रकार, जब अन्तःकरण की शुद्ध और पवित्र हो जाता है तब अनायास ही आत्मानुवेदन और ब्रह्मानुभूति की प्रतीति होने लगती है। अन्तःकरण की शुद्धि से समस्त इन्द्रियों के व्यवहार स्वतः ही शुद्ध हो जाते हैं, और कर्मों की पवित्रता भी सम्पादन हो जाती है।

पवित्रता के सम्पादन में दिव्य जनों तथा मननशील व्यक्तियों की संगति बड़ी लाभदायक होती है। दिव्य जनों तथा मननशीलों के सत्संग से बुद्धि का परिष्कार होता है। बुद्धि के परिष्कार से सब भूत पवित्रता प्रदान करने लगते हैं। पवित्र बुद्धि से दृष्टि पवित्र होती है। पवित्र दृष्टि से भूतमात्र {पंचभूत तथा प्राणी} में पवित्रता अनुभव होती है। जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि। पवित्र दृष्टि, पवित्र सृष्टि। विकृत दृष्टि, विकृत सृष्टि। पवित्र दृष्टि से कण-कण, अणु-अणु और बिन्दु-बिन्दु में, पवमान की पवमानी पवित्रता के, सुन्दर सौन्दर्य के दर्शन होते हैं।

अपने वातावरण को पवित्र बनाइए, तथा अपने अन्दर और बाहर से सर्वथा शुद्ध हो जाइए। अन्तःकरण विमल हो, इन्द्रिया शुद्ध, पवित्र हों। सब करण, उपकरण सर्वथा शुद्ध हों। देह शुद्ध हो। गेह शुद्ध हो। वस्त्र शुद्ध हों। खान-पान शुद्ध हो। सब ओर से, सब प्रकार से सदा सर्वत्र, शुद्धता और पवित्रता का सुसम्पादन कीजिये।
शुद्धता में सम्पूर्ण ऋद्धियां तथा सिद्धियां निहित हैं। पवित्रता ही परम सौन्दर्य है। पवित्रता में ही पवमान का सौन्दर्य उद्बुद्ध होता है। पवमान की आराधना और उपासना से पूर्ण पवित्रता प्राप्त होती है। पुनः-पुनः गाइए:

‘पवमानः पुनातु मा।’

‘पवमान मुझे पवित्र करे, पवमान मुझे सदा पवित्र रखे।’

श्रद्धा

स्वामी विद्यानंद जी 'विदेह'

श्रद्धां देवा यजमाना वायुगोपा उपासते।
श्रद्धा हृदय्ययाकूत्या श्रद्धया विन्दते वसु।।

ऋग्वेद १॰.१५१.४

श्रद्धा=श्रत्+धा,
     सत्य+धारणा,
     सत्य+धारण,
     आत्म+विश्वास।
सहज विश्वास अथवा अन्धविश्वास का नाम श्रद्धा नहीं है। सत्य को निश्चयपूर्वक जानकर, उसे दृढ़ता के साथ धारण करना श्रद्धा है। सत्य धारणा अथवा निष्ठा के साथ, अभीष्ट की साधना में लगे रहना  श्रद्धा है। आत्मविश्वास के साथ साध्य की साधना में जुट जाना श्रद्धा है। हृदयसंकल्प के साथ लक्ष्य की ओर प्रवृत्त रहना श्रद्धा है। हृदय की गहन भावना के साथ साधना करना श्रद्धा है।

देव श्रद्धा द्वारा ही देवत्व को प्राप्त होते हैं। यज्ञानुष्ठानी श्रद्धा द्वारा ही यज्ञफल {सुखैश्वर्य} प्राप्त करते हैं। यज्ञशील श्रद्धा द्वारा ही श्रेष्ठतम कर्मों की साध में निरत रहते हैं। वीर श्रद्धा द्वारा ही विजयलाभ  करते हैं। योगी भी श्रद्धा द्वारा ही योगसाधना में सिद्धि प्राप्त करते हैं। हृदयसंकल्प में ही श्रद्धा का निवास है। निस्सन्देह हृदय की भावना ही श्रद्धा है।

श्रद्धा से प्रत्येक धन प्राप्त होता है। श्रद्धावान् किसी भी ऐश्वर्य को प्राप्त कर सकता है।

श्रद्धा के साथ, दृढ़संकल्प और निश्चय के साथ योगपथ पर आरूढ़ हूजिए; आप बहुत शीघ्र सफल होंगे। विश्वास रखिए और प्रसन्नता के साथ योगानुष्ठान प्रारम्भ कीजिए।

(देवाः) देवजन, (यजमानाः) यज्ञानुष्ठानी, यज्ञशील जन और (वायु-गोपाः) प्राणरक्षक जन (हृदय्यया आकूत्या) हृदय भावना द्वारा (श्रद्धाम् श्रद्धाम्) अभीष्ट को प्राप्त कराने वाली श्रद्धा को (उपासते) उपासते हैं। वे (श्रद्धया) श्रद्धा से ही (वसु) धन, अभीष्ट (विन्दते) प्राप्त करते हैं।

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

आकांक्षा

स्वामी विद्यानंद जी ,विदेह,
यदग्ने स्यामहं त्वं त्वं वा घा स्या अहम्।
स्युष्टे सत्या इहाशिषः।। 
ऋग्वेद ८.४४.२३

आकांक्षा योग की पुरोगवी है। मनुष्य उसी की प्राप्ति के लिए यत्नशील होता है जिसकी उसे आकांक्षा होती है। योग की सिद्धि का आधार आकांक्षा ही है। जब योग की, प्रभुमिलन की तीव्र आकांक्षा होती है तभी ब्रह्मप्राप्ति के साधनों की ओर प्रवृत्ति होती है। आकांक्षा जितनी तीव्र होती है उतनी ही शीघ्र उसे योग में सिद्धि प्राप्त होती है।
एक रूप-लावण्यमयी परम सुन्दरी समस्त शृंगारों से सुशोभित और सम्पूर्ण सुखसाधनों से सुसम्पन्न होकर भी गहन वेदना और अन्तःव्यथा से व्यथित रहती है, यदि उस पतिपरायणा को अपने पति का योग-सुमिलन प्राप्त नहीं है। दूसरी ओर एक अन्य सुन्दरी है जिसके पास न शृंगार की कोई वस्तु है, न कोई सुख के विशेष साधन हैं, पर उसे अपने प्राणप्रिय पति का संयोग प्राप्त है। पूर्व-सुन्दरी की अपेक्षा अवर-सुन्दरी कहीं अधिक सुखी है। इस संसार में अनेक सुखराशियां हैं, अनेक शोभन शृंगार हैं, अनेक सुखोपभोग हैं, पर प्रेमी के लिए वे सब िवधवा के शृंगार के समान निस्सार हैं, यदि उसे अपने सत्पति की सुसंगति प्राप्त नहीं है।
दो के मिलन में बड़ा सुख है। दो के मिलन में अपार और अकथनीय शान्ति मिलती है। जलबिन्दु सागर से संगत होकर सागर बन जाता है, सुखसागर हो जाता है। पति पत्नी के आत्ममिलन में, बन्धु के स्नेलसंयोग में, सखा सखा के सुमिलन में कैसी अवर्णनीय अभितुष्टि प्राप्त होती है! आत्मा भी अपने आनन्दस्वरूप  ब्रह्मसखा से मिलकर ही आनन्दी होता है। जो उसे प्राप्त कर लेता है वह आनन्दी होता है। जो उससे संगत हो जाता है, संसार की समस्त सुखराशियां, निस्सन्देह, उसी को मुबारिक होती हैं। जिसे उसका सुमिलन प्राप्त हो जाता है वही सच्चा सौभाग्यशाली है। परन्तु कितने हैं जो उससे संगत होने के लिए आतुर हैं ? मानव उससे प्रजा, सुख, वैभव और ऐश्वर्य तो मांगते हैं, पर कितने हैं जो उससे उसी को मांगते हैं ? यदि आप उससे संगत होना चाहते हैं तो उसके सुमिलन के लिए आतुर, आकुल, व्याकुल और विह्वल हूजिए। जब आप उससे मिलने के लिए आतुर हो उठेंगे तब आपको उससे साक्षात्कार के बिना, ये सरस प्रतीत होनेवाली, मायामयी मोहकताएं नीरस प्रतीत होने लगेंगी, और जब तक आप उससे संगत न हो लेंगे तब तक आप न विराम लेंगे, न विश्राम।
(अग्ने) कमनीय देव ! (यत्) काश (अहम् त्वम् स्याम्) मैं तू हो जाऊँ, तुझसे संगत हो जाऊँ, (वा) या (त्वम् घ अहम् स्याः) तू ही मैं हो जाए, तू ही मुझमें प्रकाशित-प्रज्वलित हो जाए तो (इह) यहाँ, इस जीवन में (ते आशिषः) तेरी आशिषें (सत्याः स्युः) सत्य हो जाएं।

आत्म-अवस्थिति वैदिक योग पद्धति

स्वामी विद्यानंद जी 'विदेह'
संस्थापक-वेद संस्थान 

वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्।
ओं क्रतो स्मर। क्लिबे स्मर। कृतं स्मर।। यजुर्वेद ४॰.१५।।

(वायुः) प्रेरक, शरीर का संचालक, आत्मा (अन्-इलम्) अपार्थिव, अभौतिक; अतः (अ-मृतम्) अमृत, अमरणधर्मा है। आत्मा अनादि, अनन्त है। न इसका कभी आदि हुआ, न इसका कभी अन्त होगा। आत्मा स्वरूप से अजर, अमर, शुद्ध और बुद्ध है। इसे न पवन सुखा सकता है, न जल गला सकता है, न पावक जला सकता है, न मृत्यु मार सकती है। (इदम्) यह (भस्म-अन्तम्) भस्म में अन्त होने वाला, मरने वाला (अथ) तो (शरीरम्) शरीर है, केवल शरीर है। प्रत्येक आत्मा की अपनी एक स्वतन्त्र सत्ता है। आत्मा आत्मरूप से न किसी का पिता है, न पुत्र; न माता है, न पुत्री; न बन्धु है, न भ्राता; न बहिन है, न भाई; न मित्र है न सखा। ये सब सांसारिक रिश्ते-नाते केवल शरीर के हैं और शरीर के साथ हैं। शरीर का अन्त होते ही सब सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं।
अत सातत्यगमने। जीव सतत गति करनेवाला होने से आत्मा कहाता है। शरीर का गमयिता, प्रेरक, संचालक यह आत्मा ही है। अहंकार के साथ जो यह कहता है, ‘मेरा मन, मेरी बुद्धि, मेरा चित्त, मेरे नेत्र, मेरे श्रोत्र, मेरी भुजा, मेरा पग, मेरा हृदय, वही इन्दियों का स्वामी इन्द्र-आत्मा है।
प्रकृति सत् है। आत्मा सत्, चित् {सच्चित्} है। देह कि स्थिति {शरीर सुख} के लिए आत्मा को प्रकृति का, और आनन्द के लिए परमात्मा का आश्रय लेना चाहिए।
आत्मा कर्ता तो है, पर केवल संचालक, प्रेरक वा चेतन रूप से। क्रियात्मक रूप से कर्म करने वाला भी शरीर ही है। कर्म को मूर्त रूप देने वाली तो शरीर की इन्द्रियां ही हैं। पितृधर्म, मातृधर्म, पुत्रधर्म, राष्ट्रधर्म, पतिधर्म, पत्नीधर्म अथवा पिता का कर्तव्य, माता का कर्तव्य, पुत्र का कर्तव्य इत्यादि, ये सब शरीर की ही अपेक्षा से हैं। सांसारिक सब सम्बन्ध और कर्म देह की अपेक्षा से ही हैं, आत्मा की अपेक्षा से नहीं।
आत्मरूप से आत्मा का शाश्वत सम्बन्ध तो एकमात्र परमात्मा से, केवल ब्रह्म से है। अतः (क्रतो) कर्तः! आत्मन! तू सदा (ओम् स्मर) ओं का स्मरण कर। सदा ओं से संयुक्त और संजुष्ट रह। सब कर्म कर, सक कार्य कर, सक सब कर्तव्य निर्वाह कर, (कृतम् स्मर) कर्तव्य कर्म और लक्ष्य का ध्यान रख, पर अपने अनिल और अमर स्वरूप को नितरां अभिलक्ष्य रखते हुए। ओं और कृत का स्मरण किसलिए ? (क्लिबे) क्लैव्य के निवारण के लिए, आत्मसंबल, आत्मस्थिति, आत्मनिश्चलता, आत्म-अवस्थिति के लिए।
दर्पण में स्वरूप के दर्शन तभी होते हैं जब दर्पण शुद्ध भी हो और स्थिर भी। जल में तभी स्वरूप के दर्शन होते हैं जब जल स्वच्छ भी हो और साथ ही, तरंगरहित अथवा स्थिर भी हो। आत्म-अवस्थिति और ब्रह्मसाक्षात्कार के लिए अन्तःकरण की विमलता की भी परम आवश्यकता है। केवल पवित्रता से काम न चलेगा, पवित्रता के साथ निश्चलता भी चाहिए।
ऐसा अभ्यास कीजिए कि किन्हीं भी अवस्थाओं और परिस्थितियों में आप सदा शान्त, स्थिर और निश्चल रह सकें। निश्चलता की दृढ़भूमिता के लिए आप सदा यह याद रखिएः
॰१. (वायुः) आत्मा (अनिलम्, अमृतम्) अजन्मा और अमर है।
॰२. (अथ) और (इदम् शरीरम्) यह शरीर (भस्मान्तम्) नश्वर है।
॰३. (क्रतो) आत्मन्! (ओम् स्मर) ओं का स्मरण रख।
॰४. (क्लिबे) आत्मस्थिति के लिए {उपर्युक्त तथ्यों को} (स्मर) रमरण रख।
॰५. (कृतम्) कृत, लक्ष्य किए हुए को (स्मर) स्मरण रख। कितनी साध सिद्ध हो चुकी,
    कितनी शेष है, यह सदा ध्यान में रख।

शुक्रवार, 1 फ़रवरी 2013

वैदिक योग पद्धति ईशविश्वास ।।१।।


स्वामी विद्यानंद जी विदेह 
संस्थापक वेद-संस्थान, अजमेर
राजस्थान
ईशविश्वास ।।१।।

स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविरं शुद्धमपापविद्धम्।
कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाष्वतीभ्यः समाभ्यः  ।।यजुर्वेद ४॰.८।।

ईश है। (सः परि अगात्) वह सर्वत्र रम रहा है। (सः शु¬क्रम्) वह सर्वशक्तिमान् है। (सः अकायम्) वह निराकार है। (सः अव्रणम्) वह रोगरहित है। (सः अस्नाविरम्) वह अस्नायु है। (सः शुद्धम्) वह शुद्ध है। (सः अपापविद्धम्) वह निष्पाप है। (सः कविः) वह क्रान्तदर्शी है। (सः मनीषी) वह परम प्राज्ञ है। (सः परिभूः) वह परिपूर्ण है। (सः स्वयम्भूः) वह स्वयम्भू है। वही (शाश्वतीभ्यः समाभ्यः) शाश्वत प्रजाओं आत्माओं के लिए (अर्थान्) अर्थों, पदार्थों, भोग्यों को (याथातथ्यतः) यथावत् (वि अदधात्) निर्धारण/समुत्पन्न किया करता है।

अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद् देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्।
तद् धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिष्वा दधाति।। यजुर्वेद ४॰.४।।

ईश है। वह (एकम्) एक है, (एन्-एजत्) निर्गत-कूटस्थ है, (मनसः जवीयः) मन से अधिक वेगवान् है; मन की वहाँ पहुंच नहीं है। (न) न (देवाः) इन्द्रियदेव ही (एनत्) इसको (आप्नुवत्) पाते हैं। (तत् पूर्वम् अर्षत् तिष्ठत्) वह पूर्व-गामी, कूटस्थ (धावतः अन्यान्) अन्य दौड़ते हुओं को (अति एति) लांघ रहा है। (तस्मिन्) उसी में (मातरिश्वा) आत्मा, अन्तरिक्ष (अपः) कर्मों-कर्मफलों, लोकों को (दधाति) धारण करता है।

तदेजति तन्नैजति तद् दूरे तद्वन्तिके।
तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः।। यजुर्वेद ४॰.५।।

ईश है। (तत्) वह (एजति) विश्व का संचालन करता है। (तत्) वह स्वयं (न एजति) स्थानान्तर नहीं होता है। (दूरे) दूर स्थान में भी (तत्) वह है। (तत् उ) वह ही (अन्तिके) समीप में भी है। (तत्) वह (अस्य सर्वस्य) इस सबके (अन्तः) अन्दर है। (तत् उ) वह ही (अस्य सर्वस्य बाह्यतः) इस सबके बाहर भी है।

विश्वास रखिए, ‘ईश है, और उसका साक्षात्कार होगा।’

सोमवार, 3 सितंबर 2012

मनमानी कब तक ?


आध्यात्मिक चिन्तन के क्षण..............

आचार्य सत्यजित् जी
ऋषि उद्यान, अजमेर

प्रभुकृपा से हमें जानने के लिए ज्ञानेन्द्रियां व बुद्धि मिले हैं। इच्छा करने के लिए मन मिला है। बुद्धि व मन में सम्बन्ध रहता है। बुद्धि स्थित ज्ञान के अनुसार ही आत्मा इच्छा करता है व तदनुसार मन विभिन्न ज्ञानेन्द्रियों व कर्मेन्दियों को प्रेरित करता है। कोई भी इच्छा या कर्म हम अपनी समझ से अपने हित के लिए ही करते हैं। अपने ज्ञान व अपनी समझ के अनुसार हम अपना हितचिंतन करते रहते हैं व तदनुसार कर्म भी। यही हमारी स्वतन्त्रता है, यह स्वतन्त्रता प्रभु का वरदान है। इस स्वतन्त्रता व वरदान का सदुपयोग भी हो सकता है व दुरुपयोग भी।

प्रभुकृपा से मिली ज्ञानेन्द्रियां प्राथमिक ज्ञान कराती रहती हैं। इनसे सुख-दुःख का भी ज्ञान होता रहता है। अनुकूल संवेदना को हम सुख के रूप में देखते हैं व प्रतिकूल संवेदना को दुःख के रूप में देखते हैं। हम सुख को पाना चाहते हैं, पुनः-पुनः पाना चाहते हैं, दुःख को पूर्णतः हटा देना चाहते हैं, दुःख को कभी नहीं पाना चाहते हैं। हम सुख के साधनों में दुःख के समान अप्रीति रखते हैं। यह हमारी इच्छाओं का प्राथमिक आधार है।

प्रभुकृपा इससे अधिक भी है। प्राथमिक ज्ञान तात्कालिक रूप से उत्पन्न सुख-दुःख पर आधारित रहता है। वह तात्कालिक सुख-दुःख में ही हित-अहित का निश्चय करता है। पर तात्कालिक सुख बाद में दुःख का कारण भी बन सकता है और तात्कालिक दुःख बाद में सुख का कारण भी बन सकता है। यहां दूर के परिणाम को सोचकर हित-अहित का निर्णय किया जाना आवश्यक है, वही वास्तविक ज्ञान है, वही उचित निर्णय है, उसी में सच्चा हित है। प्रभु कृपा से इसके लिए हमें बुद्धि मिली है, स्मृति मिली है। पूर्व अनुभूत सुख-दुःख व उसके परिणामों का परस्पर सम्बन्ध व विश्लेषण हम कर सकते हैं।

प्रभुकृपा से यह सब विश्लेषण करने की सामर्थ्य हमारे में है, किन्तु हम पूरी तरह इसका प्रयोग नहीं करते, सदा इसका प्रयोग नहीं करते। इसके अभाव में हम तात्कालिक सुख-दुःख/ हित-अहित तक सीमित रहते हुए अपने निर्णय करते जाते हैं, जीवन को उसी प्रकार बिताते जाते हैं। इसी में हम अपनी संतुष्टि मान लेते हैं। यह मनमानी है। दूरगामी परिणाम देखकर तदनुसार कर्म करना प्रारम्भ में कठिन लगता है, अतः उसे करने में हमारी अरुचि/अप्रीति रहती है। प्राथमिक ज्ञान के आधार पर जीवन चलाते जाना तो पशु-पक्षीवत् ही जीवन जी रहे होते हैं। मानवोचित जीवन तो दूरगामी परिणाम देखकर कर्म करने में ही सम्भव है।

प्रभुकृपा से जो मानव दूरगामी परिणाम देखकर निर्णय लेते हैं, वे जीवन में अधिक कुशल-सफल-सुखी-संतुष्ट रहते हैं। पर यहां भी इतने मात्र से संतुष्ट हो जाना अपने को परिपूर्णता से वंचित कर देना है। दूरगामी परिणाम को देखकर कर्म करने वालों के निर्णयों में भी विभिन्नताएं देखी जाती हैं, ऊंच-नीच देखी जाती है। कारण है, दूरगामी दृष्टि व विश्लेषण की सामर्थ्य में न्यूनाधिकता होना।

जीवन को हम भी देख-समझ रहे हैं। जीवन को अन्य भी देख-समझ रहे हैं। जीवन को पूर्वजों ने भी देखा-समझा था। जीवन को ईश्वर भी समझता है। ऋषियों ने जीवन को देख-समझकर जो निर्णय दिए, उनसे हमारे निर्णय भिन्न भी होते हैं। ऋषि लोग उच्च सात्विक प्रतिभा युक्त होते हैं, निश्चय ही उनके निर्णयों से भिन्न निर्णय आने की स्थिति में रुककर पुनर्विचार करना आवश्यक है। हम क्यों न अन्यों के अनुभवों-निर्णयों का भी लाभ उठायें ? कम से कम विचारें तो सही। आखिर उनके व हमारे निर्णयों में भेद का कारण क्या है ? बिना ऋषि मुनियों से तुलना के चलने वाला जीवन मनमाना जीवन बन जाता है।

प्रभु ने कृपा करके वेदों में जीवन जीने की दृष्टि प्रदान कर दी है। ऋषियों के निर्णयों में आंशिक त्रुटि की संभावना भले ही रहे, पर सर्वज्ञ प्रभु के निर्णय तो असंदिग्ध हैं, त्रुटि की संभावना से परे है। क्या हमारे निर्णय वेद के निर्णयों से मेल खाते हैं ? मेल न बैठने पर क्या हम उस पर गंभीरता से विचार करते हैं ? यदि हम ऐसा नहीं करते, तो भले ही कितना भी दूर तक विचार करें, विश्लेषण करें, तो भी निर्णयों में पर्याप्त त्रुटि संभव है। ऐसे में अपने ही निर्णयों पर चलते चले जाना मनमानी करना है।

मनमानी का परिणाम हमारी इच्छानुसार हो, यह आवश्यक नहीं। परिणाम तो व्यवस्थानुसार ही आना है। हमें जो परिणाम चाहिए, प्रत्येक आत्मा को जो परिणाम चाहिए उसके लिए ही तो ऋषियों ने व ईश्वर ने अपने निर्णय हमारे सामने रख दिये हैं। मनमाना चलने में इच्छानुसार परिणाम आना संदिग्ध है। वेदों-ऋषियों के अनुसार चलने में इच्छानुसार परिणाम आना निश्चित है। हम मनमानी करना चाहते हैं या मनमाना परिणाम चाहते हैं ? मनमानी करने से मनमाना परिणाम नहीं आता, उचित रीति से करने से मनमाना परिणाम आता है। निर्णय हमें करना है, हमें मनमानी करना प्रिय हो या मनमाने परिणाम प्राप्त करना प्रिय हो? मनमाने परिणाम प्राप्त करने हैं तो मनमानी करना छोड़ना होगा। मनमानी करते हुए हम मनमाने परिणाम से कब तक दूर रहना चाहते हैं ? कब तक मनमानी करेंगे ? कब तक मनमाने परिणाम से दूर रहेंगे ? मनमानी कब तक ?