बुधवार, 24 दिसंबर 2014

स्तुति विषय।।2।।

अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। 
होतारं रत्नधातमम्।।2।।

व्याख्यानः- हे वन्द्येश्वराग्ने ! आप ज्ञानस्वरूप हो, आपकी मैं स्तुति करता हूं।
सब मनुष्यों के प्रति परमात्मा का यह उपदेश है, हे मनुष्यों ! तुम लोग इस प्रकार से मेरी स्तुति, प्रार्थना और उपासनादि करो जैसे पिता वा गुरु अपने पुत्र वा शिष्य को शिक्षा करता है कि, तुम पिता वा गुरु के विषय में इस प्रकार से स्तुति आदि का वत्र्तमान करना वैसे सबके पिता और परम गुरु ईश्वर ने हमको कृपा से सब व्यवहार और विद्यादि पदार्थों का उपदेश किया है जिससे हमको व्यवहार ज्ञान और परमार्थ ज्ञान होने से अत्यन्त सुख हो। जैसे सबका आदिकारण ईश्वर है वैसे परम विद्या वेद का भी आदिकारण ईश्वर है।
हे सर्वहितोपकारक ! आप ‘‘पुरोहितम्’’ सब जगत् के हितसाधक हो, हे यज्ञदेव ! सब मनुष्यों के पूज्यतम और ज्ञान-यज्ञादि के लिये कमनीयतम को ‘ऋत्विजम्’ सब ऋतु वसन्त आदि के रचक, अर्थात् जिस समय जैसा सुख चाहिये उस सुख के सम्पादक आप ही हो ‘‘होतारम्’’ सब जगत् को समस्त योग और क्षेम के देनेवाले हो और प्रलय समय में कारण में सब जगत् का होम करनेवाले हो ‘‘रत्नधातमम्’’ रत्न अर्थात् रमणीय पृथिव्यादिकों के धारण रचन करनेवाले तथा अपने सेवकों के लिये रत्नों के धारण करनेवाले एक आप ही हो। हे सर्वशक्तिमन् परमात्मन् ! इसलिये मैं वारम्वार आपकी स्तुति करता हूं इसको आप स्वीकार कीजिये, जिससे हम लोग आपके कृपापात्र होके सदैव आनन्द में रहें।।2।।

महर्षि दयानंद जी सरस्वती महाराज 

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

पाप का घड़ा एक न एक दिन भरता अवश्य है

राम और श्याम दो मित्र थे। दोनों ने दूध बेचने का व्यापार प्रारम्भ किया। राम स्वभाव से ईमानदार, शान्तिप्रिय, सज्जन व्यवहार का था जबकि श्याम कुटिल, लालची एव क्रूर स्वभाव का था। राम ने सदा ईमानदारी से दूध बेचा और कभी मिलावट नहीं की। जबकि श्याम पानी मिलाकर दूध बेचता रहा। धीरे-धीरे श्याम धनी बनता गया और राम निर्धन का निर्धन बना रहा। धीरे-धीर राम के मन में एक विचार बार-बार घर करने लगा कि क्या व्यक्ति को अधर्म से ही सुख मिलता है ? राम के मन में यह विचार उठ ही रहा था कि एक साधु उनके गाँव में पधारे। राम ने उनके समीप जाकर कहा-महात्मा जी मनुष्य धर्म से फलता है अथवा अधर्म से। महात्मा जी मुस्कुराए एवं राम को अगले दिन इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए आने को कहा। राम जब अगले दिन उनके समीप पहुँचा तो उसने देखा कि महात्मा जी के यहाँ पर धरती में आठ फुट गहरा गढ़ा खुदा हुआ है। महात्मा जी ने राम को उस गढ़े में खडे़ होने को कहा। अब उस गढ़े में जल डाला जाने लगा। जब जल राम के पैरों तक पहुँच गया तो महात्मा जी ने पूछा कोई कष्ट। राम ने उत्तर दिया नहीं कोई कष्ट नहीं है। जब जल राम की कमर तक पहुँच गया तो महात्मा जी ने पुनः पूछा कोई कष्ट ? राम ने कहा नहीं। जब जल राम के सिर तक पहुँच गया तो महात्मा जी ने पूछा कोई कष्ट ? राम ने उत्तर दिया महात्मा जी बाहर निकालिए नहीं तो प्राणों पर बन आयेगी। महात्मा जी ने राम को बाहर निकाला और पूछा अपने प्रश्न का उत्तर समझे ? राम ने कहा नहीं समझा। महात्मा जी ने कहा-’’जब पानी आपके पैरों, कमर, गर्दन तक पहुँचा तब आपको कष्ट नहीं हुआ और जैसे ही सिर तक पहुँचा आपके प्राण निकलने लगे। इसी प्रकार से पापी व्यक्ति के पाप जब एक सीमा तक बढ़ते जाते हैं तब एक समय ऐसा आता है कि उसके फल से उसका बच निकलना संभव नहीं होता और वह निश्चित रूप से अपने पापों का फल भोगता है। मगर पापों का फल मिलना निश्चित है।’’ 
अन्यायोपार्जितं द्रव्यं दशवर्षाणि तिष्ठति।
प्राप्त एकादशे वर्षे समूलं च विनश्यति।।

बुधवार, 24 सितंबर 2014

विश्व-शान्ति दिवस और हम

नन्द किशोर आर्य
गुरुकुल कुरुक्षेत्र
हरियाणा

‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ सम्पूर्ण विश्व एक परिवार है, संस्कृत के इस सारस्वत कथन में मनुष्य ही नहीं अपितु सभी प्राणियों के प्रति बन्धुभाव प्रकट होता है। सृष्टि का कण-कण अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्रतिक्षण कार्य में संलग्न है। ईश्वर की इस विराट संरचना में कुछ भी तो ऐसा नहीं है जो व्यर्थ हो। इन सब अद्भुत रचनाओं में विश्व की सभी आत्माओं को स्वतन्त्रता पूर्वक कार्य करने के लिए परमात्मा की ओर से प्राप्त अनुपम भेंट मानव के शरीर का मिलना है। मानव से भिन्न प्रत्येक प्राणी ईश्वर प्रदत्त स्वभाव के अनुकूल ही अपने-अपने कार्य में संलग्न हैं। इस सारी कायनात का बुद्धिपूर्वक यदि कोई सीधा-सीधा लाभ लेता है तो वह केवल और केवल मनुष्य ही है। विज्ञान के अधुनातन विकास से पूर्व तक मनुष्य अपने जीवन जीने के साधनों को प्राप्त करने में लगा रहा। आवश्यकताओं के अनुकूल होते गए आविष्कारों ने जहाँ मानव को सुख, समृद्धि एवं शान्ति प्रदान की वहीं बेतहाशा बढ़ती लालसा के कारण मानव ने अपने सहित पृथ्वी, आकाश, सागरों, नदियों, वनों एवं सम्पूर्ण प्रकृति मात्र को अशान्ति की ओर धकेल दिया है। स्वार्थ की पशुवृत्ति ने मानव को इतना निर्दयी बना डाला कि वह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने से उत्पन्न पीड़ा तक को अनुभूत नहीं कर पा रहा है।

प्रतिवर्ष विश्वभर में विश्व शान्ति दिवस अथवा अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति दिवस 21 सितम्बर के दिन पूरी पृथ्वी पर अहिंसा को कायम रखने के लिए एवं शान्ति का सन्देश देने के लिये मनाया जाता है। यह दिवस सभी देशों और लोगों के बीच स्वतन्त्रता, शान्ति और प्रसन्नता का एक आदर्श माना जाता है। वर्ष 1982 से प्रारम्भ होकर 2001 तक सितम्बर मास के तीसरे मंगलवार को विश्व शान्ति दिवस के रूप में मनाया जाता रहा, लेकिन वर्ष 2002 से इसके लिए 21 सितम्बर का दिन निश्चित कर दिया गया, तब से यह दिवस इसी तिथि को मनाया जाता है।

प्रारम्भिक काल में व्यक्ति अपनी मूल आवश्यकताओं तक सीमित रहकर उपलब्ध संसाधनों से अपना काम चलाता रहा। समय बीतने के साथ ही मानव में संग्रह की प्रवृत्ति प्रबल होने लगी। संग्रह की गई वस्तुओं के संवर्धन एवं संरक्षण के साथ ही शान्ति की अथाह गहराई से उठकर उसने स्वयं ही अशान्ति का चोला ओढ़ना प्रारम्भ कर दिया। क्षणिक सुख की चाह में वस्तुओं का निरन्तर संग्रह करने से यह लबादा दिन-प्रतिदिन दृढ़ होता गया। सीमित आयु में असीमित पाने की इच्छा ही व्यक्ति को अशान्ति के गहरे गर्त में धकेल देती है। जो तेरा है वह तेरा ही है जो मेरा है वह भी तेरा है यह दैवीय भाव हैं, जो तेरा है वह तेरा है और जो मेरा है वह मेरा है यह मानवी भाव है, जो मेरा है वह मेरा ही है लेकिन जो तेरा है वह भी मेरा ही है यह आसुरी विचार मनुष्य के सुख-चैन को समाप्त कर घोर नरक की ओर ले जाने वाला है। जीओ और जीने दो की देव संस्कृति को छोड़ आसुरी कुसंस्कृति की ओर झुकना ही अशान्ति के प्रथम द्वार को खोलना है। अशान्ति व्यक्ति से परिवार, परिवार से समाज, समाज से देश एवं देश से सम्पूर्ण वसुधा में प्रसृत होती गई। 

लगभग सभी देश इस समय जन-धन की अपार हानि से प्रतिदिन जूझ रहे हैं। इस वैश्विक हानि की समस्या का प्रमुख कारण मात्र आतंकवाद ही है। आतंकवाद विकृत, सड़ी-गली एवं उन्मादी मानसिकता से उत्पन्न मानवता के प्रति किया गया घृणित अपराध है। अकारण स्वयं ही किसी को भी अपराधी मानकर परमात्मा की इस सुन्दरतम रचना का विनाश करना कितना अधम व अक्षम्य अपराध है, इसकी कल्पना मात्र से ही शरीर के रोंगटे खडे़ हो जाते हैं। निरपराध एवं अबोध छोटे बालकों, प्राणों की भीख माँगती महिलाओं, असहाय व चलने में अक्षम वृद्धों व निःशस्त्र युवाओं पर घात लगाकर अथवा प्रत्यक्ष रूप से मौत के घाट उतार देना आतंकियों की पतित मानसिकता का परिचय देने के लिये पर्याप्त है। आह! इनकी नीचता की पराकाष्ठा तो तब देखने को मिलती है, जब वे कोमलमति लघुवय बालक-बालिकाओं के करुण-क्रन्दन को अनसुना कर, उनके हृदय व मस्तिष्क को चीरकर, अपना निवाला बनाकर, क्रूर पशुओं को भी लजा देते हैं। मानवता के इन घृणित अपराधियों की इस बिलबिलाहट के कारण सम्पूर्ण मानवजाति पर समाप्ति का खतरा मंड़रा रहा है।

दिलों में जिनके लगती है, वो आँखों से नहीं रोते।
जो अपनों के नहीं होते, किसी के भी नहीं होते।
समझते जो पराया दर्द, अपने दर्द से ज्यादा।
किसी के रास्ते में वो, कभी काँटे नहीं बोते।।

एक समुदाय दूसरे समुदाय को निगल जाना चाहता है, एक असभ्यता दूसरी सभ्यता को नष्ट करने पर उतारु है, एक जाति दूसरी जाति को समूल नष्ट कर देना चाहती है एक शक्तिशाली देश दूसरे दुर्बल राष्ट्र के संसाधनों को हड़प जाना चाहता है। समुदायों, सभ्यताओं जातियों एवं देशों को नष्ट कर देने वाली ये ताकतें मानवमात्र को शान्ति से जीने का अधिकार नहीं दे सकती ? नस्लभेद, अस्पृश्यता, जातिभेद, आर्थिक असमानता ऐसे विषबुझे तीर हैं जो मानवता को लम्बे समय से निरन्तर मर्माहत कर रहे हैं। इक्कीसवीं सदी के विकसित समाज में भी बहुत से लोग पाषाण युग के पाशविक काल में जीना पसन्द करते हैं। हम शान्ति लाने का प्रयास तो करें। अहिंसा परमो धर्म भारत का मूलमन्त्र रहा है। शान्तिप्रियता इस देश की अकूत सम्पदा सदा से रही है। यदि किसी क्रूर व आततायी शासक को शान्ति की राह में कभी रोड़ा भी समझा तो उसे ऐसे ही समाप्त नहीं कर दिया अपितु उसे सही राह पर आने के अवसर प्रदान किये गये। हमारे इतिहास में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने रावण को युद्ध से पूर्व शान्ति-सन्देश भेजा, योगिराज श्रीकृष्णचन्द्र महाभारत के युद्ध से पूर्व स्वयं शान्तिदूत बन कौरवों के पास गए। महात्मा चाणक्य ने घनानन्द से सीमाओं पर शान्ति रहे ऐसी ही प्रार्थना तो की थी। भयंकर परिणामों वाले हिंसा के मार्ग को कभी-कभी क्रूर व्यक्तियों को सबक सिखाने के लिए अपनाना पड़ता है। कभी-कभी हिंसा के गर्त से निकलकर सम्राट अशोक जैसे अहिंसक बन व्यक्तित्व महात्मा बुद्ध के अहिंसा के सदुपदेश को मानवमात्र तक पहुँचने का सफल प्रयास करते हैं।

परस्पर मैत्रीभाव शान्ति की जड़ों को गहराई तक ले जाता है। मित्रस्य चक्षुषा वयं सर्वाणि भूतानि समीक्षामहे अर्थात् हम सब एक दूसरे को मित्र की दृष्टि से देखें, यजुर्वेद का यह पावन मन्त्र शान्ति का पवित्र उद्घोष करता प्रतीत होता है। मनुर्भव जनया देव्यं जनम् हम सही मायनों में मनुष्य बन अपनी आने वाली पीढि़यों को भी मनुष्य बनने का उपदेश करें। आज भी असमानता का नर्तन समाज में देखने को मिल जाता है। समानता के साथ समरसता होने पर ही मानव, मानव बन सकता है लेकिन समरसता केवल समभाव से नहीं अपितु ममभाव से आती है, जब हम समता की बात करें तो वहाँ ममता को भी उच्चपद प्रदान करने की आवश्यकता रहती है। अयं निजः परोवेति गणना लघुचेतसाम्। यह मेरा है यह तुम्हारा है यह तुच्छबुद्धि की बातें हैं, उदारचेता व्यक्ति पूरी वसुधा को एक परिवार मानकर व्यवहार करते हैं। आसुरी-भावों को मन-मन्दिर से बाहर निकाल फेंके। भौतिक उन्नति के साथ ही साथ आध्यात्मिक उन्नति की समाज में अत्यन्त आवश्यकता है। अक्षरज्ञान व तकनीकी ज्ञान के अतिरिक्त छात्रों को नैतिक व चारित्रिक ज्ञान भी करायें। आकाश की ऊँचाई को स्पर्श करने की अभिलाषा के साथ ही अपनी जमीनी हकीकत से भी वाकिफ रहें। जीवन में ऊँचा चाहे कितना भी उठें लेकिन नीचे पायदान पर खडे़ लोगों के हृदय के स्पन्दन की अनुभूति को महसूस अवश्य करते रहें तभी मानव जन्म की सार्थकता सिद्ध होगी।

विश्व शान्ति दिवस के उपलक्ष्य में मैं इतना ही कहना चाहता हूँ:-

शपथ लेकर हम निरन्तर शान्तिपथ पर ही चलें।
सामने बाधा हो कितनी, हिंसक विचारों को मलें।
क्रूरता कितनी हो फिर भी शान्तिभाव से बढे़ं पलें।
सुखी, नीरोगी सब हों नित अभाव किसी का कभी न खले।

सोमवार, 20 जनवरी 2014

थोड़ी सी जागरूकता

आध्यात्मिक चिन्तन के क्षण..............
आचार्य सत्यजित् जी
ऋषि उद्यान, अजमेर (राजस्थान)

          प्रभुकृपा से बहुत से मनुष्यों को जीवन का अंतिम लक्ष्य जानने-समझने का अवसर प्राप्त हो जाता है। यह संसार भले ही बहुत अधिक भौतिकवादी, बहुत अधिक विषयभोगी, बहुत अधिक बहिर्मुखी, बहुत अधिक अधार्मिक हो गया हो तथा और अधिक होता जा रहा हो। इस संसार में भले ही कितना अधिक आकर्षण हो, कितने अधिक फिसलन के अवसर हों, कितनी अधिक विपरीत स्थितियां  हों, फिर भी यहीं और इसी संसार में बहुत से मनुष्यों में साधना करने की भावना उभरती है, वे इसे जानने-समझने का प्रयास करते हैं और फिर साधना के लिए प्रयत्न भी आरम्भ कर देते हैं, तदनुरूप सफलता भी प्राप्त करते रहते हैं।
          संसार की इतनी विपरीत दिखाई देने वाली स्थिती में भी प्रभुकृपा से बहुत से व्यक्ति साधना का निश्चय कर पाते हैं, यह संभव है, यह प्रत्यक्ष है। संसार के आकर्षण, विषय-भोग के कारण मनुष्य को क्षण-क्षण में फिसलते देखा जाता है, अन्याय-अत्याचार-अधर्म करते देखा जाता है। इसे अन्यों में व अपने में बार-बार होता देख कर बहुत स्वयं को व अन्यों को साधना के अयोग्य समझने लगते हैं, किन्तु बहुत से मनुष्य इससे सीख लेकर साधना की ओर और अधिक प्रवृत्त हो जाते हैं, अपने को साधना-मार्ग में और अधिक दृढ़ कर लेते हैं।
          प्रभुकृपा से प्रत्येक मनुष्य को ऐसे अन्तःकरण मिले हैं, जिनका सदुपयोग करके वह जीवन के सही मार्ग पर चल सकता है, साधना में प्रवृत्त होकर अपने जीवन को साधनामय बना सकता है। संसार के विषय-भोग व ऐश्वर्य अन्यन्त आकर्षक हैं, प्रथम दृष्ट्या यही अनुभव में आता है, यही अनुभव में आयेगा। इस आकर्षण व विषय-भोग के काल में जो मनुष्य थोड़ी सी जागरूकता रख पाता है, वह इनके दल-दल से ऊपर उठ जाता है। प्रभुकृपा से जागरूकता सभी व्यक्ति रख सकते हैं, प्रत्येक के पास इतना सामर्थ्य व साधन (अन्तःकरण) उपलब्ध हैं। विषयाकर्षण के समय यदि मनुष्य बह भी जावे, किन्तु थोड़ी से जागरूकता साथ में रख ले, तो बार-बार विषय-प्रवाह में बहने-फिसलने पर भी वह एक समय आने पर इनसे विरत होने लगता है।
प्रभुकृपा से संसार के विषय-भोग, आकर्षण, ऐश्वर्य ऐसे कभी नहीं थे, न हैं व न होंगे कि मनुष्य इनमें सदा फंसा-धंसा रह जाये। थोड़ी सी जागरूकता रख लेने से मनुष्य अपने को विषय-प्रवाह में देर तक सहन नहीं कर सकता। आत्मा को जिस सुख-शान्ति की पिपासा है, वह वहां होता ही नहीं है, तो आत्मा उसे कैसे सहन कर सकता है ? यदि जागरूकता नहीं है, तब तो उसे संसार के सुख ही अन्तिम सुख लगेंगे, तब तो संसार के दुःखों को भोगता हुआ, उनसे पीड़ित होता हुआ, उनसे पिसता हुआ भी वह संसार के सुखों को पाने की तृष्णा में ही डूबा रहेगा।
          प्रभुकृपा से इस थोड़ी से जागरूकता के लिए जितान ज्ञान, जितनी समझ प्रारम्भ में चाहिए, वह हर मनुष्य को मिलती रहती है। यदि उस थोड़ी सी समझ, थोडे़ से ज्ञान, थोडे़ से अनुभव की रक्षा की जाये, उसे रक्षित करने व बढ़ाने का प्रयत्न किया जाये, तो यही अनुभव-ज्ञान-समझ मनुष्य को साधना-पथ पर प्रवृत्त व स्थिर करने का सर्वप्रमुख व निश्चित कारण बन जाता है। ऐसा व्यक्ति साधना न कर पाने का दोष संसार, समाज, परिस्थिति आदि को नहीं देता। संसार, समाज, परिस्थिति आदि के विपरीत होने पर भी इस अनुभव-ज्ञान-समझ के आधार पर अपनी आंतरिक अवस्था ऐसी बना लेता है कि बाह्य बाधायें उसे साधना से हटा नहीं पातीं। यदि थोड़ा विचलन आता भी है तो वह एक नया अनुभव देकर जाता है, नई समझ देकर जाता है। यही समझ-जागरूकता उसे और अधिक सबल बना देती है, वह पुनः साधना-पथ पर आरूढ़ व स्थिर होकर अपने चरम लक्ष्य को पाने में संलग्न हो जाता है।

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

अमूल्य जीवन

आध्यात्मिक चिन्तन के क्षण..............
आचार्य सत्यजित् जी
ऋषि उद्यान, अजमेर (राजस्थान)

     प्रभुकृपा से यह मानव शरीर मिला। प्रगति का अद्वितीय अवसर। मुक्ति के बारे में कुछ सोचने-करने का एक मात्र अवसर। एक दुर्लभ अवसर जो चित्त-शुद्धि का अवसर प्रदान करता है, ऐसा अवसर जो योग-साधना जैसी पवित्र प्रक्रिया को जानने-समझने-करने के लिये समर्थ है।
    यह सब जानते-समझते हुए भी हम इस दिशा में अल्प प्रयत्नशील हैं। बार-बार भावनापूर्वक प्रयास करते हुए भी पुनः पुनः शिथिल हो जाते हैं। मानव-जीवन को प्रभुकृपा मानते हुए भी ईश्वर के प्रति बहुत कम कृतज्ञ हो पाते हैं। प्रभुकृपा को स्वीकारते हुए भी उसकी अति शुभ व सर्वथा कल्याणी वाणी-उपदेश के प्रति गंभीर नहीं रह पाते हैं। प्रगति का अद्वितीय अवसर पाकर भी इससे वह अद्वितीय प्रगति नहीं कर पाते, जो परमपिता परमात्मा हमसे चाहता है। परमपिता परमात्मा की हम पुत्रों-आत्माओं से अपेक्षा है कि हम संपूर्ण दुःखों से दूर होकर ईश्वरीय नित्य-आनन्द को प्राप्त करें। यह अद्वितीय मानव-जीवन अद्वितीय न रहकर द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ स्तर का बन गया है, क्योंकि हम द्वितीय-तृतीय-चतुर्थ या और भी निचले स्तर के कार्यों-लक्ष्यों को ध्यान में रख कर जीवन बिताने लगे हैं।
      प्रभुकृपा से मुक्ति के लिये मिले इस एक मात्र अवसर मानव-जीवन को हम एक मात्र मुक्ति के लिये न सोचकर अन्य सामान्य प्रयोजनों के लिये बिताये चले जा रहे हैं। यह दुर्लभ अवसर चित्त-शुद्धि के लिये न होकर चित्त-विकृति के लिये उपयोग में लिया जा रहा है। लौकिक व्यवहारों में आसक्त होकर हम अनजाने ही चित्त को अत्यधिक अशुद्ध किये जा रहे हैं। थोड़ी बहुत की जाने वाली शुद्धि की क्या सार्थकता रह जाती है, जब हम उससे बहुत अधिक अशुद्धि बटोरते जा रहे हैं।
     प्रभुकृपा से योग-साधना के प्रति श्रद्धा व आदर का भाव रखते हुए भी, इसे श्रेष्ठ मानते हुए भी, इसे सुख-शान्ति-धैर्य-संतोष-तनाव रहित अवस्था की प्राप्ति का उपाय मानते हुए भी इसकी उपेक्षा करते चले जा रहे हैं। दिन-भर में मिले समय में से अत्यल्प समय योग-साधना के लिये दे रहे हैं।
     प्रभुकृपा से हम इस दिशा में कुछ सोचना भी आरम्भ कर दें, तो जीवन में पवित्रता-शांति-संतोष का अवतरण होना ही है। कठिन दिखने वाली योग-साधना जीवन में उतरने लगेगी ही। प्रभु का दिखाया मार्ग अचूक है, अपवाद रहित है, परम-कल्याण-कारक है।

बुधवार, 1 जनवरी 2014

आन्तरिक शुद्धि - प्रतिदिन का कार्य


आध्यात्मिक चिन्तन के क्षण..............

आचार्य सत्यजित् जी
ऋषि उद्यान, अजमेर (राजस्थान)

      प्रभुकृपा से हमें अत्युत्तम उपकरण मन-बुद्धि की प्राप्ति हुई है। मानव शरीर में ये दोनों सबसे प्रमुख हैं। इनके समुचित प्रयोग से हम मुक्ति को प्राप्त कर सकते हैं और दुरुपयोग से बंधन में रहते हुए दुःख को भोगने के लिए बाध्य होते रहते हैं। मन-बुद्धि की मलिनता के रहते जब इनका प्रयोग किया जाता है, तो ये हानिकारक-बंधनकारक-दुःखदायक बन जाते हैं। मन-बुद्धि की मलिनता कम हो या मलिनता न हो तो ये लाभदायक-मुक्तिदायक-सुखदायक बन जाते हैं।
      मन-बुद्धि की अशुद्धि-मलिनता जन्मजन्मान्तरों की है। पूर्व के न जाने कितने जन्मों से हम विषय-भोग, राग-द्वेष, काम-क्रोध-लोभ-मोह-ईष्र्या-अहंकार आदि करते चले आ रहे हैं, उन सबकी मलिनता के ढेर को साथ लेकर हम जन्मे थे। इस जन्म में भी बाल्यावस्था से ही पूर्व कुसंस्कार व अज्ञानता के कारण पुनः पुनः विषय-भोग, राग-द्वेष आदि की ओर प्रवृत्त होते रहते हैं। इस प्रकार हमने अपनी मलिनता को और बढ़ा लिया होता है। जब तक हमें इस मलिनता व इसकी हानियों का बोध नहीं होता, हम इसी तरह जीवन जीते हुए अपने अन्तःकरण को और अधिक मलिन करते चले जाते हैं।
प्रभुकृपा से हमें इस बार मानव शरीर मिला है। यही एक मात्र जीवन है जिसमें हम अपनी मलिनता को हटा सकते हैं। प्रभुकृपा से जिन्हें कुछ बोध हो गया है और जो अपने को शुद्ध करने में लग गये हैं, वे भी पूर्व कुसंस्कारों व अज्ञान के कारण बार-बार अपने को मलिन भी करते रहते हैं। ऐसे मानव जिन्हें इस मलिनता की कुछ समझ बन गई है, जो नई मलिनता से कुछ बचते भी हैं और पुरानी मलिनता को हटाने का प्रयास भी कर रहे होते हैं, वे भी प्रायः अपने इन कुछ प्रयासों को पर्याप्त समझने लगते हैं। इसका कारण यह है कि कुछ प्रयास भी श्रमसाध्य होते हैं, हम अपने इस श्रम को पर्याप्त समझकर संतुष्टि का भाव बना लेते हैं तथा अधिकांश अन्यों को इस दिशा में कुछ न करता देख या बहुत कम करता देख, अपने प्रयास को अधिक/पर्याप्त मान बैठते हैं।
      प्रभुकृपा से हमें अपनी मलिनता की अधिकता व भयंकरता का सम्यक् बोध हो जाये तो हमें आन्तरिक-शुद्धि के लिये किये जा रहे अपने प्रयास बहुत कम लगेंगे। धार्मिक कहे-समझे जाने वाले अधिकांश व्यक्ति दिन-भर में कुल मिलाकर अपनी मलिनता को कुछ बढ़ा रहे होते हैं। हमें वर्तमान में प्रतिदिन होने वाली मलिनता को भी पूरा हटाते रहना है व पिछली मलिनता को भी कुछ न कुछ कम करते रहना है। यदि हम प्रतिदिन होने वाली मलिनता को ही हटाते रहें, तो भी मुक्ति नहीं पा सकते, क्योंकि पिछली मलिनता तो अभी बनी हुई है। इससे इतना बड़ा लाभ होगा कि हम पतन को प्राप्त नहीं होंगे, पर इतने मात्र से उन्नति तो नहीं होगी, मात्र यथास्थिति बनी रहेगी।
      प्रभुकृपा हम पर है। प्रभुकृपा को सदुपयोग में लाकर हमें प्रतिदिन आन्तरिक-शुद्धि को करना है। हमें प्रतिदिन पिछली मलिनता को भी कुछ न कुछ कम करना है। नई मलिनतायें जो पूर्व संस्कारवशात्, परिस्थितिवशात्, असावधानी से या जागरूकता की कमी से बन जाती हैं उन्हें भी हटाना है। नई मलिनता न आने पाये, इसकी भी पूरी सावधानी रखनी है। प्रभु की कृपा से, ऋषियों की कृपा से इस विषय का ज्ञान वेदों में, उपनिषदों में, दर्शनों में व अन्य ऋषिकृत ग्रन्थों में आज भी उपलब्ध है। जागरूक व्यक्ति स्वयं भी मार्ग खोजकर आगे बढ़ सकता है। हमारे लिये यह परम सौभाग्य की बात है कि हम प्रतिदिन अपनी आन्तरिक-शुद्धि कर पायें, इतनी कि वह शुद्धि की मात्रा नई मलिनता की मात्रा से कुछ न कुछ अधिक हो।
आन्तरिक-शुद्धि का यह कार्य दीर्घकालसाध्य है। यह बडे़ धैर्य की अपेक्षा रखता है। इसका परिणाम बहुत अच्छा व बड़ा है। यह आनन्द, सन्तोष व आत्मविश्वास को देने वाला है। आन्तरिक-शुद्धि में लगा व्यक्ति योग-मार्ग में स्थिर हो जाता है, उसका सारा विचलन व भटकाव समाप्त हो जाता है। वह प्रभु की विशेष कृपा का पात्र बन जाता है।